

कोलकाता : शहर की प्रतिष्ठित अकादमी ऑफ फाइन आर्ट्स का पुराना टिकट काउंटर इन दिनों रंगों की राजनीति का केंद्र बन गया है। महज 200 वर्ग फुट का यह ढांचा पिछले 31 दिनों में तीन बार अपना रंग बदल चुका है।
पहले इसका पारंपरिक टेराकोटा रंग (मिट्टी के जैसा रंग) बदला गया, फिर इसे भगवा रंग से रंगा गया, उसके बाद रंग को सफेद किया गया और अब एक बार फिर इसे भगवा रंग दे दिया गया। इस घटनाक्रम ने कला, संस्कृति और राजनीति के बीच नई बहस छेड़ दी है। इस विवाद को कई लोग “बंगाल की आत्मा की लड़ाई” के रूप में देख रहे हैं।
संस्कृति बनाम राजनीति की बहस
गौरतलब है कि मंगलवार को रंगमंच से जुड़े कलाकारों और सांस्कृतिक हस्तियों ने टिकट काउंटर को सफेद रंग से रंगते हुए दावा किया कि इसकी मूल पहचान टेराकोटा थी और उसे ही संरक्षित किया जाना चाहिए।
उनका कहना था कि किसी सांस्कृतिक धरोहर को राजनीतिक प्रतीक का रूप नहीं दिया जाना चाहिए। कलाकारों ने इस मुद्दे को बंगाल की सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक पहचान से जोड़ते हुए इसे बचाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
भाजपा का पलटवार, बढ़ा विवाद
बुधवार को भाजपा से जुड़े कार्यकर्ताओं और नेताओं ने दोबारा टिकट काउंटर को भगवा रंग से रंग दिया। उनका कहना था कि भगवा त्याग, संस्कृति और भारतीय परंपरा का प्रतीक है तथा इसे विवाद का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए।
इस घटनाक्रम के बाद दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए। एक ओर सांस्कृतिक संगठनों ने इसे विरासत से छेड़छाड़ बताया, वहीं दूसरी ओर भाजपा नेताओं ने इसे सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर उचित ठहराया।
लगातार बदलते रंगों ने अकादमी ऑफ फाइन आर्ट्स के इस छोटे से टिकट काउंटर को राज्य की व्यापक राजनीतिक और सांस्कृतिक बहस का प्रतीक बना दिया है। कला जगत के कई लोगों का मानना है कि सांस्कृतिक संस्थानों को राजनीतिक संघर्ष का मंच नहीं बनाया जाना चाहिए,
जबकि राजनीतिक दल इसे अपनी-अपनी विचारधारा और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से जोड़कर देख रहे हैं। इसी कारण यह रंग विवाद अब केवल एक इमारत के रंग तक सीमित न रहकर बंगाल की पहचान और सांस्कृतिक विरासत पर चल रही व्यापक बहस का हिस्सा बन गया है।