

कोलकाता : सुंदरवन से लेकर मालदा तक नदी कटाव, समुद्री जलस्तर बढ़ने, चक्रवात और बाढ़ के कारण घर-बार छोड़ने को मजबूर लोगों की पीड़ा अब देश की जनगणना में अलग पहचान पाएगी।
गौरतलब है कि आगामी जनगणना में पहली बार “प्राकृतिक आपदा” को पलायन के कारण के रूप में दर्ज किया जा रहा है। इससे आपदा के कारण विस्थापित हुए परिवारों का आधिकारिक आंकड़ा सामने आने की उम्मीद है।
घटता जा रहा सुंदरबन का भू-भाग
दक्षिण 24 परगना के मौसुनी और घोड़ामारा द्वीपों में समुद्री कटाव की स्थिति बेहद गंभीर है। घोड़ामारा का क्षेत्रफल 1972 में करीब 7.2 वर्ग किमी था, जो 2022 तक घटकर लगभग 3.6 वर्ग किमी रह गया।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि मौजूदा रफ्तार जारी रही तो 2032 तक यह करीब 2.6 वर्ग किमी रह सकता है। कलकत्ता विश्वविद्यालय के तटीय भू-आकृति विशेषज्ञों ने भी सागर द्वीप में भूमि क्षरण की ओर ध्यान दिलाया है।
मालदा में भी कटाव से उजड़ रहे परिवार
मालदा में गंगा के लगातार बदलते बहाव से कई बस्तियां प्रभावित हुई हैं। जनगणना में इस कारण को दर्ज किए जाने से नीति-निर्माताओं और शोधकर्ताओं को आपदा से जुड़े विस्थापन की वास्तविक तस्वीर समझने में मदद मिल सकती है।