दुर्गा पूजा ने बदली किस्मत: आर्ट छात्रों के लिए बना रोजगार का मंच

आर्ट कॉलेज के स्टूडेंट्स सौरभ नंदी, अभिषेक परोल, सिद्धार्थ साधुखां की तस्वीर
आर्ट कॉलेज के स्टूडेंट्स सौरभ नंदी, अभिषेक परोल, सिद्धार्थ साधुखां की तस्वीर
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राम बालक, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : महानगर कोलकाता की दुर्गा पूजा अब केवल आस्था और भक्ति का पर्व नहीं रही, बल्कि यह युवाओं, खासकर आर्ट कॉलेज के छात्रों के लिए रोजगार का एक सशक्त माध्यम बन चुकी है। इस पर्व के दौरान बड़े पैमाने पर सजावट, पेंटिंग और थीम निर्माण जैसे कार्यों की मांग बढ़ती है, जिससे अनेक छात्रों को आर्थिक आत्मनिर्भरता का अवसर मिलता है। हावड़ा जिले के डोमजूर निवासी सौरभ नंदी इसकी एक मिसाल हैं। वे वर्तमान में कल्याणी विश्वविद्यालय से आर्ट की पढ़ाई कर रहे हैं। पढ़ाई के खर्च निकालने के लिए सौरभ दुर्गा पूजा के दौरान पंडालों में पेंटिंग, अल्पना और सजावटी कार्य करते हैं। इस वर्ष वे अपने साथियों अभिषेक परोल और सिद्धार्थ साधुखां के साथ कोलकाता के प्रसिद्ध हाजरा पार्क दुर्गोत्सव 2025 में "दृष्टिकोण – किछु अज्ञात गल्प, किछु रुद्धद्वार कल्पना" थीम पर कार्य कर रहे हैं।

आर्ट कॉलेज के छात्र पंडाल में पेंटिंग करते हुए
आर्ट कॉलेज के छात्र पंडाल में पेंटिंग करते हुए

कला बना सहारा: पढ़ाई के साथ-साथ आय का भी स्रोत बनी दुर्गा पूजा

तीनों कलाकार पंडाल की रंगाई, अल्पना, मूर्ति सजावट और अन्य कलात्मक कार्यों में लगे हुए हैं। इस दौरान उन्हें प्रति व्यक्ति लगभग 12 से 15 हजार रुपये की आय हो जाती है, जिससे वे अपनी पढ़ाई की फीस और आर्ट सामग्री का खर्च वहन कर पाते हैं। सौरभ बताते हैं कि कला से जुड़ाव उनका जुनून है। उनके अनुसार, "भाषा के अस्तित्व से पहले भी चित्र ही अभिव्यक्ति का माध्यम थे। इसी कारण मैंने कला को जीवन का मार्ग चुना।"

गुरु की प्रेरणा और कला का समर्पण: युवाओं के लिए रोजगार का नया रास्ता

इस दिशा में सौरभ और उनके साथियों को प्रेरणा उनके गुरु विमल शाह से मिली, जो स्वयं एक वरिष्ठ, अनुभवी और समर्पित कलाकार हैं। विमल शाह ने न केवल उन्हें कला की बारीकियाँ सिखाईं, बल्कि यह भी समझाया कि कैसे रचनात्मकता को एक सकारात्मक दिशा देकर जीवन में आत्मनिर्भरता लाई जा सकती है। उनके मार्गदर्शन ने छात्रों को अपने हुनर को पहचानने और उसे व्यावसायिक रूप देने की प्रेरणा दी। ऐसे में दुर्गा पूजा जैसे सांस्कृतिक उत्सव केवल परंपरा, श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक भर नहीं हैं, बल्कि ये पर्व आज के युवाओं के लिए हुनर दिखाने, पहचान बनाने और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने का भी एक सशक्त मंच बनते जा रहे हैं। यह पर्व रचनात्मकता और रोजगार को जोड़ने वाला एक जीवंत उदाहरण है, जो कला क्षेत्र से जुड़े विद्यार्थियों के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोलता है।

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