

सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : हाल के वर्षों में आये न्यायिक फैसलों ने कराधान के क्षेत्र में सार को महत्व देने की आवश्यकता को रेखांकित किया है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस आर. महादेवन ने यह टिप्पणी की। वे इनकम टैक्स बार एसोसिएशन की पहल पर एवाल्विंग लैंडस्केप ऑफ टैक्सेशन, लिटिगेशन एंड रेगुलेटरी फ्रेमवर्क इन इंडिया विषय पर बोल रहे थे। जस्टिस महादेवन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया फैसलों में यह सुनिश्चित किया है कि विदेशी भूमि में संचालित कंपनियां व्यक्तिगत लाभ के लिए अंतरराष्ट्रीय कर संधियों के प्रावधानों का दुरुपयोग नहीं करें। उन्होंने कहा कि कर से बचने के लिए कृत्रिम संरचनाएं बनाने के बजाय वास्तविक निवेश को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
उन्होंने इस वर्ष जनवरी में जस्टिस जे बी पारदीवाला के साथ दिये गये एक फैसले का उल्लेख किया, जो ई-कॉमर्स कंपनी फ्लिपकार्ट की हिस्सेदारी बिक्री से जुड़ा था। इसमें अमेरिकी खुदरा दिग्गज वालमार्ट की भूमिका रही थी। यह मामला अंतरराष्ट्रीय कर संधि और निवेश ढांचे से संबंधित था। जस्टिस महादेवन ने कहा कि भारत में प्रत्यक्ष कर व्यवस्था आज चौराहे पर खड़ी है। वैश्वीकरण, डिजिटल वाणिज्य और सीमापार लेन-देन पारंपरिक कर अवधारणाओं—जैसे क्षेत्रीयता और स्थायी प्रतिष्ठान को चुनौती दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि यूपीआई, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और स्टार्टअप संस्कृति के विस्तार के साथ भारत तेजी से डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ा है।
ऐसे में प्रत्यक्ष कर ढांचे को अधिक पारदर्शी, न्यायसंगत और विकासोन्मुख बनाने के लिए विधायी लचीलापन, न्यायिक दूरदृष्टि और प्रशासनिक दक्षता आवश्यक है। सेमिनार को C.V. Bhadang, अध्यक्ष, Income Tax Appellate Tribunal ने भी संबोधित किया। उन्होंने विधायी प्रक्रिया में कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर अत्यधिक निर्भरता के प्रति आगाह किया। D.R.L. Reddy, उपाध्यक्ष, आईटीएटी (कोलकाता जोन) ने कहा कि ट्रिब्यूनल की नयी इमारत इस वर्ष के अंत तक तैयार हो जाएगी। कार्यक्रम में S.K. Tulsiyan, अध्यक्ष, ITBA ने भी अपने विचार रखे। विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते वैश्विक और डिजिटल परिवेश में भारत की प्रत्यक्ष कर प्रणाली को समयानुकूल सुधारों के साथ आगे बढ़ाना होगा, ताकि कर व्यवस्था निष्पक्ष, निश्चित और निवेश के अनुकूल बन सके।