

कोलकाता : प्रकाशन संस्था दीप प्रकाशन ने भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारी एवं लेखक सी. मुरुगन के नए उपन्यास ‘रुस्तम खान एस/ओ नोआखाली’ का विमोचन किया। शनिवार को कोलकाता प्रेस क्लब में आयोजित समारोह में प्रख्यात साहित्यकार शीर्षेंदु मुखोपाध्याय और जानी-मानी अभिनेत्री गार्गी रॉयचौधरी ने पुस्तक का लोकार्पण किया। इस अवसर पर उपन्यास के बंगाली संस्करण ‘नोआखालिर रुस्तम खान’ का भी विमोचन किया गया।
ऐतिहासिक घटनाओं की पृष्ठभूमि पर आधारित यह उपन्यास प्रेम, मानवीय संवेदना, धार्मिक पहचान और सांप्रदायिक सौहार्द जैसे महत्वपूर्ण विषयों को उठाता है।
‘रुस्तम खान एस/ओ नोआखाली’ की कहानी इतिहास के एक संवेदनशील और रक्तरंजित दौर में प्रेम तथा मानवीय मूल्यों की तलाश करती है। उपन्यास का केंद्रीय प्रश्न है कि क्या इंसान धर्म के लिए है या धर्म इंसान के लिए? लेखक ने इस प्रश्न के माध्यम से धार्मिक पहचान, सामाजिक विभाजन और सांप्रदायिक नफरत से जूझते समाज की मानसिकता को सामने रखने का प्रयास किया है।
पुस्तक के लेखक सी. मुरुगन ने बताया कि पश्चिम बंगाल में अपने करियर के दो दशकों से अधिक समय बिताने के दौरान उन्हें राज्य के भूगोल, संस्कृति और यहां के लोगों को करीब से जानने का अवसर मिला। इसी अनुभव ने उन्हें बंगाल की पृष्ठभूमि पर एक कहानी लिखने के लिए प्रेरित किया।
सी. मुरुगन के अनुसार, इस कहानी के माध्यम से वह पाठकों तक एक सरल, लेकिन गहरा संदेश पहुंचाना चाहते हैं। किसी व्यक्ति का आकलन केवल उसकी धार्मिक पहचान के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि उसके भीतर मौजूद मानवीय संवेदना, करुणा और सहानुभूति को महत्व देना चाहिए।
लेखक का मानना है कि धर्म और समुदाय से परे इंसानियत को प्राथमिकता देना ही समाज को नफरत और विभाजन से बाहर निकालने का रास्ता है।
दीप प्रकाशन के प्रोपराइटर शंकर मंडल ने कहा कि ‘रुस्तम खान एस/ओ नोआखाली’ मानवीय संवेदनाओं पर आधारित एक मार्मिक उपन्यास है, जिसे गंभीरता और ईमानदारी के साथ लिखा गया है।
उन्होंने बताया कि संवेदनशील ऐतिहासिक घटनाओं की पृष्ठभूमि में बुनी गई प्रेम कहानी के साथ उपन्यास में बंगाल के इतिहास, संस्कृति, परंपराओं, लोककथाओं और भौगोलिक सौंदर्य को भी शामिल किया गया है।
कहानी की विषयवस्तु और व्यापक सामाजिक संदर्भ को देखते हुए प्रकाशन संस्था ने इसे अधिक से अधिक पाठकों तक पहुंचाने के उद्देश्य से बंगाली भाषा में भी प्रकाशित करने का निर्णय लिया।
इसी क्रम में ‘नोआखालिर रुस्तम खान’ शीर्षक से बंगाली संस्करण तैयार किया गया है। शंकर मंडल ने विश्वास जताया कि दोनों भाषाओं के पाठक इस कहानी से जुड़ाव महसूस करेंगे और इसकी मानवीय संवेदनाओं को सराहेंगे।