‘असंभव’ सिर्फ एक शब्द है, जब तक कोई लड़की उसे संभव न बना दे : कैप्टन अर्चना कपूर

‘असंभव’ सिर्फ एक शब्द है, जब तक कोई लड़की उसे संभव न बना दे : कैप्टन अर्चना कपूर
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कक्षा छह में देखा था एयरफोर्स पायलट बनने का सपना, आज बोइंग 787 की सीनियर कमांडर के रूप में भर रहीं उड़ान

सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : ‘आप नहीं कर सकतीं’ जैसी बातें किसी लड़की के सपनों की उड़ान को रोक नहीं सकतीं, बशर्ते उसमें खुद पर विश्वास और अपने लक्ष्य को हासिल करने का दृढ़ संकल्प हो। एयर इंडिया की सीनियर कमांडर कैप्टन अर्चना कपूर की कहानी इसी जज्बे और संघर्ष की मिसाल है। अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस के अवसर पर उन्होंने अपने जीवन के अनुभव साझा करते हुए युवा लड़कियों को संदेश दिया कि असंभव केवल एक शब्द है, जिसे अपनी मेहनत और आत्मविश्वास से संभव बनाया जा सकता है।

कक्षा छह में देखा था एयरफोर्स पायलट बनने का सपना

कैप्टन अर्चना कपूर ने बताया कि जब वह छठी कक्षा में थीं, तभी उन्होंने अपने पिता की तरह भारतीय वायुसेना में पायलट बनने का सपना देखा था। उनके पिता भारतीय वायुसेना में हेलीकॉप्टर पायलट थे। उनकी वर्दी और काम के प्रति समर्पण से प्रेरित होकर अर्चना भी पायलट बनना चाहती थीं। हालांकि, उनके पिता ने उन्हें बताया कि चश्मा पहनने वाली लड़कियां पायलट नहीं बन सकतीं और उस समय वायुसेना में महिला पायलट भी नहीं थीं। ऐसे में उन्हें डॉक्टर बनने की सलाह दी गई।

इसके बावजूद उड़ान भरने का उनका सपना कभी खत्म नहीं हुआ। उन्होंने अपनी कुछ सहेलियों के साथ मिलकर मंत्रियों, सेना के अधिकारियों और अन्य जिम्मेदार लोगों को पत्र लिखकर सवाल किया कि महिलाओं को वायुसेना में पायलट बनने का अवसर क्यों नहीं मिलना चाहिए।

1994 में पहली 14 महिला कैडेटों में मिली जगह

वर्ष 1992 में भारतीय वायुसेना ने महिलाओं को पायलट के रूप में शामिल करने की घोषणा की। इसके दो साल बाद, 1994 में अर्चना कपूर उन शुरुआती 14 महिलाओं में शामिल हुईं, जिन्हें वायुसेना अकादमी में प्रशिक्षण के लिए चुना गया था।

अपने करियर के दौरान उन्हें लैंगिक पूर्वाग्रह का भी सामना करना पड़ा। एक वरिष्ठ नेविगेटर ने शुरुआत में उनके साथ उड़ान भरने को लेकर आशंका जताई थी। बाद में खराब मौसम में एक चुनौतीपूर्ण मिशन के दौरान अर्चना ने अपने प्रशिक्षण और कौशल का परिचय देते हुए मिशन को सुरक्षित रूप से पूरा किया। उड़ान के बाद उसी अधिकारी ने उनसे माफी मांगी और अपनी नवजात बेटी के लिए आशीर्वाद मांगा, ताकि वह भी बड़ी होकर अर्चना जैसी बन सके।

कैप्टन कपूर के लिए यह उनके करियर के सबसे यादगार क्षणों में से एक रहा। उनके अनुसार, अपने काम को पूरी ईमानदारी और दक्षता से करना भी लोगों की सोच बदलने का माध्यम बन सकता है।

वायुसेना से नागरिक विमानन तक का सफर

कैप्टन अर्चना कपूर ने भारतीय वायुसेना में करीब एक दशक तक सेवाएं दीं। प्रशिक्षण के दौरान उन्होंने उड़ान और ग्राउंड विषयों, दोनों में शीर्ष स्थान हासिल किया। इसके बाद उन्होंने नागरिक विमानन का रुख किया और एयरबस ए320 विमानों पर प्रशिक्षक के रूप में काम किया। बाद में उन्होंने नागरिक विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए) में सीनियर फ्लाइट ऑपरेशंस इंस्पेक्टर की जिम्मेदारी भी निभाई।

इन भूमिकाओं ने उन्हें उड़ान संचालन, प्रशिक्षण, सुरक्षा मानकों और जवाबदेही के विभिन्न पहलुओं को समझने का अवसर दिया। वर्तमान में वह एयर इंडिया में बोइंग 787 की सीनियर कमांडर हैं। बोइंग 787 जैसे आधुनिक विमान की कमान संभालने को वह अपने करियर का एक और महत्वपूर्ण पड़ाव मानती हैं।

युवा महिला पायलटों को आगे बढ़ते देखना सबसे बड़ी खुशी

कैप्टन कपूर का मानना है कि विमानन क्षेत्र में सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है। इसके पीछे प्रशिक्षण देने वालों, मार्गदर्शन करने वालों और साथ काम करने वाली टीम का भी योगदान होता है। उन्होंने कहा कि नेतृत्व का अर्थ केवल अधिकार जताना नहीं, बल्कि दूसरों में आत्मविश्वास पैदा करना और उन्हें बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रेरित करना है।

उन्होंने कहा कि आज विमानन क्षेत्र में महिलाओं के लिए अवसर बढ़े हैं। युवा महिला पायलटों को आत्मविश्वास के साथ कॉकपिट में अपनी जिम्मेदारी निभाते देखना उनके लिए बेहद संतोषजनक है। जिस समय उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की थी, उस दौर में कॉकपिट में महिलाओं की मौजूदगी बहुत कम थी।

लड़कियों को दिया आत्मविश्वास और धैर्य का संदेश

अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर युवा लड़कियों को संदेश देते हुए कैप्टन कपूर ने कहा कि जीवन में हर लक्ष्य तुरंत हासिल नहीं होता। कई बार रास्ते में मुश्किलें और असफलताएं आती हैं, लेकिन उनका अर्थ यह नहीं है कि मंजिल तक पहुंचना संभव नहीं है।

उन्होंने कहा कि अगर वह अपनी छोटी उम्र वाली खुद से बात कर पातीं, तो उसे दो बातें जरूर कहतीं, धैर्य रखो और खुद पर विश्वास करो। एयर इंडिया के कार्गो विभाग में काम करते हुए उड़ान भरने के अवसर का इंतजार करने वाली लड़की एक दिन बोइंग 787 की कमान संभालेगी, यह उन्होंने भी कभी नहीं सोचा था।

उनका संदेश है कि आत्मविश्वास ही अक्सर उस सपने के बीच का अंतर होता है, जो केवल सपना बनकर रह जाता है और जो हकीकत में बदल जाता है। लड़कियों को दूसरों की सीमित सोच से अपने भविष्य का फैसला नहीं करने देना चाहिए, क्योंकि कई बार असंभव समझे जाने वाले काम को पूरा करने वाली कोई साधारण लड़की ही होती है, जो अपने सपने पर विश्वास करना नहीं छोड़ती।

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