20 दिन मौत से जंग के बाद नई जिंदगी

मणिपाल अस्पताल की बहु-विषयक टीम ने 27 वर्षीय महिला को सड़क हादसे से बचाया
20 दिन मौत से जंग के बाद नई जिंदगी
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एक भीषण सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल 27 वर्षीय महिला ने 20 दिनों तक जिंदगी और मौत से जूझने के बाद आखिरकार नई जिंदगी पाई। साल्टलेक स्थित मणिपाल अस्पताल के डॉक्टरों की बहु-विषयक टीम ने गंभीर छाती की चोट, सांस लेने में विफलता, सेप्सिस और एक दुर्लभ ब्रोंकोप्ल्यूरल फिस्टुला जैसी जानलेवा जटिलताओं का सफलतापूर्वक इलाज कर महिला की जान बचाई।

अस्पताल के अनुसार, मिता मंडल (बदला हुआ नाम) को 13 अगस्त को अस्पताल लाया गया था। वह सड़क किनारे फुटपाथ पर खड़ी थी, तभी एक चारपहिया वाहन ने उसे टक्कर मार दी। अस्पताल पहुंचने के समय उसकी हालत बेहद गंभीर थी। उसकी सांस की नली प्रभावित थी, सांस लेने में अत्यधिक परेशानी हो रही थी, सक्रिय रक्तस्राव था और चेतना का स्तर काफी कम हो गया था। हादसे में उसके दाहिने हाथ की हड्डी भी टूट गई थी।

जांच में दोनों तरफ कई पसलियों के फ्रैक्चर, उरोस्थि (sternum) में फ्रैक्चर और दोनों फेफड़ों में गंभीर चोट का पता चला। आपात स्थिति में दोनों तरफ चेस्ट ड्रेन लगाए गए। सांस की नली को स्थिर करने और जरूरी पुनर्जीवन प्रक्रिया के बाद महिला को वेंटिलेटर पर रखा गया।

इलाज के बावजूद उसकी स्थिति गंभीर बनी रही। 16 अगस्त को उसकी ऑक्सीजन की जरूरत बढ़ने लगी और बुखार के साथ छाती की इमेजिंग में भी स्थिति बिगड़ती दिखाई दी। लंबे समय तक वेंटिलेटर की आवश्यकता को देखते हुए 20 अगस्त को ट्रेकियोस्टॉमी की गई।

सामने आई दुर्लभ और जानलेवा जटिलता

21 अगस्त को अचानक फेफड़ों में पानी भरने (पल्मोनरी एडिमा) और त्वचा के नीचे हवा जमा होने (सबक्यूटेनियस एम्फीसीमा) की समस्या बढ़ गई। आगे की जांच में दाहिनी ओर ब्रोंकोप्ल्यूरल फिस्टुला की आशंका सामने आई। यह एक दुर्लभ और गंभीर स्थिति है, जिसमें सांस की नली और फेफड़ों के आसपास की झिल्ली (प्ल्यूरल स्पेस) के बीच असामान्य रास्ता बन जाता है। इससे लगातार हवा का रिसाव होता रहता है और मरीज को प्रभावी तरीके से वेंटिलेट करना बेहद मुश्किल हो जाता है।

बहु-विषयक टीम के मूल्यांकन के बाद 22 अगस्त को कार्डियोथोरेसिक सर्जिकल टीम ने आपातकालीन सर्जरी की। इसमें ब्रोंकोप्ल्यूरल फिस्टुला को बंद करने, कई टूटी पसलियों को स्थिर करने और लगातार हो रहे एयर लीक की मरम्मत की गई।

सर्जरी के बाद भी स्थिति चुनौतीपूर्ण रही। शुरुआत में करीब 100 से 130 मिलीलीटर प्रति मिनट की दर से एयर लीक जारी रहा। इसे नियंत्रित करने के लिए विशेष वेंटिलेशन तकनीकों और लगातार श्वसन निगरानी का सहारा लिया गया, ताकि हवा के रिसाव को कम करने के साथ मरीज के शरीर में पर्याप्त ऑक्सीजन पहुंचती रहे।

सेप्सिस ने बढ़ाई चुनौती

इलाज के दौरान महिला को सेप्सिस, लगातार बुखार, एनीमिया और रक्त के जमने से जुड़ी समस्याओं का भी सामना करना पड़ा। उसे रक्त चढ़ाया गया और संक्रमण की पहचान के लिए बार-बार माइक्रोबायोलॉजिकल जांच की गई। जांच में पेशाब में कैंडिडा और रक्त में नॉन-कॉलरा वाइब्रियो प्रजाति के बैक्टीरिया की मौजूदगी सामने आई। इसके बाद संवेदनशीलता जांच के आधार पर एंटीमाइक्रोबियल उपचार में बदलाव किया गया।

गंभीर संक्रमण और लगातार बनी गंभीर स्थिति को देखते हुए दाहिनी ह्यूमरस (बांह की हड्डी) के फ्रैक्चर की तत्काल सर्जरी को टाल दिया गया और हाथ को इमोबिलाइजेशन के जरिए स्थिर रखा गया।

धीरे-धीरे लौटी सांस

अगले कुछ दिनों में महिला की हालत में धीरे-धीरे सुधार होने लगा। उसे इनवेसिव मैकेनिकल वेंटिलेशन से पोर्टेबल BiPAP और फिर धीरे-धीरे बिना किसी अतिरिक्त ऑक्सीजन के सामान्य कमरे की हवा पर लाया गया। एयर लीक पूरी तरह बंद हो गया, चेस्ट ड्रेन में जमा द्रव में सुधार हुआ और सर्जिकल घाव भी संतोषजनक तरीके से भर गया।

20 दिनों तक चले गहन और बहु-विषयक उपचार के बाद मिता मंडल को स्थिर हालत में अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। छुट्टी के समय वह स्वयं सांस ले रही थीं। हालांकि, उन्हें ट्रेकियोस्टॉमी ट्यूब और यूरिनरी कैथेटर के साथ घर पर देखभाल तथा विशेषज्ञों की नियमित फॉलो-अप सलाह दी गई।

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