

लगातार असफलताओं ने महाराज सूर्यभानु सिंह को विचलित कर दिया था। उन्होंने
अपने पिता द्वारा संचालित शासित मिथिला राज्य की प्रतिष्ठा को देखा था। पूरे भारत
में इसकी ख्याति थी लेकिन अब दिन बदल चुके थे। सूर्यभानु के शासन संभालते ही
जैसे सब कुछ बदल गया था। अतीत के गौरव की कहानी के अक्षर अब मिटने लगे थे।
अब नगर में जहाँ-तहाँ लूटपाट और हत्याएँ भी होने लगी थीं।
सूर्यभानु प्रतापी थे, साहसी योद्धा थे। उन्हें न्याय और निर्भीकता प्रिय थी। अनेक
सद्गुणों के बावजूद वे प्रजा को अच्छा शासन नहीं दे पा रहे थे। उनके मन में हमेशा
एक ही सवाल गूँजता रहता-‘आखिर ऐसा क्यों?’
निरन्तर आत्मविश्लेषण के बाद उनके जेहन में तीन सवाल उभरे-‘किस कार्य को कब
करूँ’? कौन सा व्यक्ति सबसे अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है तथा कौन-सा कार्य सबसे
अधिक महत्वपूर्ण है?’
इन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर में कुशल व्यवस्था का रहस्य छिपा है। यह सत्य बार-बार
उनके अन्तः करण में बिजली की तरह कौंध उठता था। अगर इन तीनों बिन्दुओं को
ध्यान में रखकर प्रबंध कार्य किया जाए तो सफलता-असफलता में कोई फर्क नहीं रह
जाएगा तथा असफलता-सफलता में बदल सकती है। ऐसा उन्हें बार-बार लग रहा था।
किन्तु इन तीनों प्रश्नों का हल कौन करेगा? यह भी एक प्रश्न था। उन्होंने अपने मंत्री
एवं सेवक-सामन्तों से विचार-विमर्श किया लेकिन कोई निदान नहीं निकला। तब उन्होंने
एक दूसरी तरकीब निकाली और समूचे राज्य में ढिंढोरा पिटवा दिया कि जो व्यक्ति मेरे
तीनों सवालों का उत्तर देगा, उसे मुँह-माँगा पुरस्कार दिया जाएगा।
मुँह-माँगा पुरस्कार पाने की लालसा में मिथिला नरेश के समक्ष अनेक अर्थशास्त्राी,
वैज्ञानिक, सैन्य विशेषज्ञ पहुँचे और अपनी-अपनी राय से अवगत कराया किन्तु महाराज
को अपनी समस्याओं का समाधान नहीं मिल पा रहा था।
तभी एक ज्योतिषी राजा के दरबार में पधारे। उन्होंने घड़ी, पल, मास-दिवस की गणना
का जाल फैलाया। अपनी गणना करके उन्होंने मिथिला नरेश को सुझाव दिया कि अमुक
दिन, अमुक कार्य करना उचित रहेगा। घड़ी-नक्षत्रों के चक्रव्यूह में महाराज को अपना
दम घुटता-सा जान पड़ा। उन्हें ज्योतिषी से भारी निराशा हुई।
एकदिन किसी दरबारी ने महाराज को बताया कि पास के एक घने वन में एक
आध्यात्मिक संत रहते हैं जो चुटकी बजाते ही किसी भी समस्या का समाधान निकाल
देते हैं। राजा अपने दल-बल के साथ संत के आश्रम में जा पहुँचे। वहाँ पहुँचकर उन्होंने
देखा कि संत कुदाल थामे मिट्टी काट रहे थे। वृद्ध शरीर, पसीने से लथपथ और
थकान के कारण वे हाँफ रहे थे।
राजा इस दृश्य को देखकर हतप्रभ रह गए। रुढ़ियों एवं मूढ़ताओं से भरी इस दुनिया में
यह व्यक्ति उन्हें अद्भुत लगा। उसके व्यक्तित्व से परिभाषित होता था-‘ईश्वर परायण
श्रमशील जीवन में ही सच्ची आध्यात्मिकता है।’ उन्होंने कुछ पल की चुप्पी के बाद
सन्त से अपने तीनों प्रश्न पूछे। सन्त चुप रहे।
ठीक उसी समय एक युवक ‘बचाओ-बचाओ’ चिल्लाता हुआ उस आश्रम के निकट पहुँचा।
युवक की बाँह में ताजा जख्म था जिससे खून टपक रहा था। राजा भागकर उसकी
सहायता के लिए उसके पास पहुँचे। युवक गिरकर बेहोश हो चुका था। पट्टी आदि
बांधकर राजा ने उसका उपचार किया और मुँह पर पानी छींटकर उसे होश में लाया।
होश में आते ही वह युवक फफक-फफक कर रो पड़ा। उसने कहा-‘महाराज, मैं तो
आपका शत्रु था और आपकी हत्या के इरादे से झाड़ी में छिपा था किन्तु आपके
अंगरक्षकों ने देख लिया और मेरी यह दुर्गति कर डाली।’ उसने कुछ रुककर कहा-आपने
पिछले वर्ष मेरे बड़े भाई को सिर्फ शक के कारण फांसी की सजा दे दी थी और उसकी
सम्पत्ति भी हड़प ली थी। तभी से मैं आपकी जान के पीछे पड़ा था। ’मुझे क्षमा करें।’
मिथिला नरेश ने उसे क्षमा करते हुए अपना दरबारी बना लिया। संत ने कहा-‘राजन्,
आपके तीनों प्रश्नों का उत्तर तत्काल घटी घटना से ही मिल गया। जब आप मेरे पास
आए थे, वही सबसे उत्तम समय था। उस वक्त मैं ही सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति था
क्योंकि यदि आप मेरे पास नहीं रुकते और यहाँ से चल देते तो यह युवक आपकी जान
ले लेता। सत्यकार्य ही सबसे अहम् है, क्योंकि घायल की रक्षा और सहायता करके
आपने पुराने शत्रु को भी मित्र बना लिया।’
संत के उत्तर से राजा पुलकित हो उठे। उन्होंने चरण स्पर्श करते हुए वापस लौटने की
आज्ञा मांगी तो उन्होंने सहर्ष अनुमति देते हुए कहा-’महाराज! हमेशा याद रखिए, सबसे
उपयुक्त समय वर्तमान ही होता है और सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति वही होता है, जो
आपके समक्ष खड़ा होता है, अतः समय को गँवाना नहीं चाहिए।‘ आनन्द कुमार अनन्त(उर्वशी)