अपने को जीतो

बाल कथा
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बहुत पुरानी बात है। किसी नगर में राजा सूर्यसेन राज्य करता था। प्रजा सुखी थी। राजा का मान करती थी। राजा भी प्रजा के सुख के लिए दिन-रात तैयार रहता था। धर्म और लक्ष्मी का भरपूर वरदान मिला था उन्हें ।

राजा सोचने लगे,‘भगवान की मुझ पर पूर्ण कृपा है। मैंने सभी को जीता है। क्या इस दुनिया में कुछ ऐसा भी है जिसे अभी जीतना शेष है ?

एक दिन वह राजमहल के बाग में बैठे थे। मौसम सुहावना था। राजा सोचने लगे,‘भगवान की मुझ पर पूर्ण कृपा है। मैंने सभी को जीता है। क्या इस दुनिया में कुछ ऐसा भी है जिसे अभी जीतना शेष है ? राजा सूर्यसेन सोचते-सोचते परेशान हो गए। उलझन के कारण रात में सो न सके। सुबह उठे तो मन अशांत था। थोड़ी देर बाद वह अकेले ही अपने गुरु दयानंद के पास पहुंचे।

सूर्यसेन ने गुरु के चरण छुए। उन्हें अपने मन की परेशानी बताई। सुनकर गुरुदेव हंस पड़े। उन्होंने पूछा,‘तुम क्या सोचते हो ?’ सूर्यसेन ने कहा,‘गुरुदेव, सब कहते हैं, मैंने दुनिया जीत ली है लेकिन मैंने तो अभी पूरी दुनिया देखी तक नहीं। मन कुछ अशांत है। मेरा मार्गदर्शन कीजिए ।’

गुरुदेव ने कहा,‘राजन्, यह सच है कि तुम राजाओं में सबसे प्रतापी हो पर अभी और कुछ भी जीतना है तुम्हें।’

गुरुदेव ने कहा,‘राजन्, यह सच है कि तुम राजाओं में सबसे प्रतापी हो पर अभी और कुछ भी जीतना है तुम्हें।’ सुनकर सूर्यसेन खड़े हो गए। बोले,‘बताइए गुरुदेव, वह क्या है? कहां जाना होगा ?’ गुरुदेव बोले,‘कहीं नहीं जाना। तुमने सबको जीत लिया पर अपने को भूल ही गए। सबसे पहले मनुष्य को अपने को जीतना चाहिए। इसके बाद ही मन में शांति आती है।’ गुरुदेव दयानंद कहते रहे, सूर्यसेन सुनता रहा। फिर राजमहल लौट आए। उन्होंने दान देना शुरू कर दिया। कहा,‘सब कुछ बांट दो । कुछ मत रखो।’

उन्होंने सारी संपत्ति दान कर दी। फिर सेनापति से कहा,‘सब पराजित राजाओं को उनके राज्य लौटा दो। उनकी राजधानियों में तैनात सैनिकों को वापस बुला लो। हमारी किसी से दुश्मनी नहीं।’

सबने समझाना चाहा। कहा,‘यह ठीक नहीं। ऐसा तो आज तक किसी ने नहीं किया।’ पर सूर्यसेन तो पक्का निश्चय कर चुके थे। उन्होंने सारी संपत्ति दान कर दी। फिर सेनापति से कहा,‘सब पराजित राजाओं को उनके राज्य लौटा दो। उनकी राजधानियों में तैनात सैनिकों को वापस बुला लो। हमारी किसी से दुश्मनी नहीं।’ सुनकर सब आश्चर्य में पड़ गए लेकिन राजा का आदेश था। उसका पालन हुआ। सब जीते हुए राज्य लौटा दिए गए। राजा के इस काम से सभी परेशान थे लेकिन राजा का मन प्रसन्न था। उन्हें विचित्र शांति अनुभव हो रही थी। लग रहा था जैसे वह हवा में उड़ रहे हों। इतना हल्का हो गया था उनका मन।

वह महल के बाहर निकले। सबको नमस्कार किया। कहा,‘मैंने सब जीता था, इसलिए छोड़ने में कष्ट नहीं हुआ। मैं चाहता हूं, खून खराबा न हो। प्रजा को कष्ट न पहुंचे।’

सारी दुनिया तो राजा सूर्यसेन जैसी थी नहीं। शत्रुओं ने सूर्यसेन के त्याग और उदारता को उनकी कमजोरी माना। वे सूर्यसेन से अपनी पराजय का बदला भी लेना चाहते थे। फिर क्या था, इकट्ठे होकर उन्होंने हमला कर दिया। यह देख सेनापति लड़ने की तैयारी करने लगा। राजा ने मना कर दिया। वह महल के बाहर निकले। सबको नमस्कार किया। कहा,‘मैंने सब जीता था, इसलिए छोड़ने में कष्ट नहीं हुआ। मैं चाहता हूं, खून खराबा न हो। प्रजा को कष्ट न पहुंचे।’

गुरुदेव ने राजा से पूछा,‘राजन्, कुछ बचा या सब दे दिया ?’ सूर्यसेन बोले,‘गुरुदेव, सब कुछ देकर आज मैंने अपने को पा लिया।

सब देखते रह गए। राजा सूर्यसेन वन में गुरुदेव दयानंद के पास जा पहुंचे। उनके शत्रु राजाओं ने नगर पर अधिकार कर लिया। देखते-देखते सत्ता पलट गई। गुरुदेव ने राजा से पूछा,‘राजन्, कुछ बचा या सब दे दिया ?’ सूर्यसेन बोले,‘गुरुदेव, सब कुछ देकर आज मैंने अपने को पा लिया। अब तक मैं शत्रुओं को जीतता रहा। किलों पर अपने झंडे फहराता रहा। अपने बारे में कभी सोचा ही नहीं था, मेरा क्या होगा।’

गुरुदेव ने सूर्यदेव के सिर पर अपना हाथ रख दिया। बोले,‘आज तुमने वह सब पा लिया जो किसी को नहीं मिला था।’ राजा सूर्यसेन गुरुदेव के साथ उनके आश्रम में रहने लगे। वह मन लगाकर गुरु की सेवा करते। शेष समय पूजा-अर्चना में लगाते। राजा से संसार-त्यागी बन जाने पर भी उन्हें कोई दुःख नहीं था।

राजा को भिखारी के रूप में देख नगर में तहलका मच गया। भीड़ जमा हो गई।

एक दिन गुरुदेव ने कहा,‘आज तुम भिक्षा लेने अपने नगर में जाओ। मुझे कुछ लाकर दो ।’

सूर्यसेन संकोच में पड़ गए। फिर भिक्षा पात्र लेकर चल दिए। राजा को भिखारी के रूप में देख नगर में तहलका मच गया। भीड़ जमा हो गई। लोग चिल्लाने लगे,‘राजा सूर्यसेन की जय।’ सूर्यसेन ने कहा,‘मैं अब तुम्हारा राजा नहीं, एक साधारण भिखारी हूं। मेरा जय-जयकार मत करो।’

लोग कहां मानने वाले थे। उनके बहुत रोकने पर भी राजा वन में लौट गए। कुछ दिन बाद गुरुदेव ने सूर्यसेन को दूसरे नगर में भेजा। वहां के राजा की मृत्यु हो गई थी। मंत्री व सेनापति सूर्यसेन के पैर पकड़ने लगे,‘आप हमें अनाथ छोड़कर न जाएं।’

सूर्यसेन परेशान हो उठे। वह सोच रहे थे,‘एक बार सब कुछ त्याग देने के बाद फिर उसी में उलझना ठीक नहीं।’

सूर्यसेन ने मना किया पर उन्हें किसी ने नहीं आने दिया। सूर्यसेन परेशान हो उठे। वह सोच रहे थे,‘एक बार सब कुछ त्याग देने के बाद फिर उसी में उलझना ठीक नहीं।’उसी समय गुरुदेव दयानंद वहां आए। उन्होंने कहा,‘सूर्यसेन, यहां की प्रजा दुखी है। उन्हें निराश मत करो । इनका शासन चलाओ ।’ सूर्यसेन को मानना पड़ा।

सूर्यसेन फिर से राजा बनकर अपने नगर में लौटे। उन्हें देखकर शत्रु भाग गए। प्रजा सुखी हो गई।

कुछ दिन बाद उनके अपने राज्य के मंत्री और सेनापति भी आए। उन्होंने कहा,‘हमसे क्या अपराध हुआ जो आपने हमें त्याग दिया। हमारे साथ चलिए।’ गुरुदेव ने फिर कहा,‘ये ठीक कहते हैं। इनके साथ जाओ।’

सूर्यसेन फिर से राजा बनकर अपने नगर में लौटे। उन्हें देखकर शत्रु भाग गए। प्रजा सुखी हो गई। एक दिन राजा सूर्यसेन महल में बैठे थे। तभी गुरुदेव दयानंद वहां आए। उन्हें देख, सूर्यसेन ने कहा,‘गुरुदेव, मैंने आपके कहने पर सब छोड़ा था, आपने फिर उसी में उलझा दिया।’

सब कुछ खोकर फिर से पाने का अपना एक सुख है। मैं चाहता था,वही सुख तुम्हें मिले।

गुरुदेव हंस पड़े। बोले,‘राजन्, मैंने देखा था, सब कुछ पाकर भी तुम अशांत हो। इसीलिए यह करना पड़ा। सब कुछ खोकर फिर से पाने का अपना एक सुख है। मैं चाहता था,वही सुख तुम्हें मिले। प्रजा को तुम्हारे जैसा राजा चाहिए। अब तुम यह सोचकर राज्य चलाओ कि समय पड़ने पर बिना हिचक इसे त्याग दोगे।’ यह कहकर गुरुदेव दयानंद वन लौट गए।

नरेंद्र देवांगन(उर्वशी)

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