...और रानी मक्खी मर गई

बाल कथा
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...और रानी मक्खी मर गईAI
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मक्खियों से तंग आ कर होटल वालों ने आखिर एक सभा बुलाई जिस में फैसला किया गया कि होटल की मिठाइयों को मच्छरदानी से ढंक कर रखा जाए और मक्खियों को उस पर बैठने न दिया जाए।

2-3 दिनों के भीतर मक्खी रानी की टोली ने देखा कि होटलों की मिठाइयां मच्छरदानी से ढंक कर रखी गई हैं। अंदर रखीं मिठाइयां साफ-साफ नजर आ रही हैं मगर उन तक पहुंचना मुश्किल है। उस रात टोली भूखी रह गई मगर मच्छरदानियों की समस्या तो अब हर रोज पेश आने वाली थी।

अगले दिन दोपहर में टोली की बैठक हुई। उस में तय किया गया कि अब सड़े गले फलों का रस चूसने में ही गनीमत है। अगर सिर्फ मिठाइयों का रस चूसने की जिद रखी गई तो भूख से बिलबिला कर मर जाना पड़ेगा।

रानी मक्खी को तैश आ गया।

बोल पड़ी, ’शेर कभी घास नहीं खा सकता। रानी कभी सड़े गले फलों का रस नहीं पी सकती। रानी मर जाएगी लेकिन मिठाइयों के अलावा किसी का रसपान नहीं करेगी। लेकिन तुम मच्छरदानियों के आरपार कैसे निकल सकती हो? एक बूढ़ी मक्खी ने पूछा।

रानी ने पंख पड़फड़ाकर, ’मैं इस शहर को छोड़ दूंगी। दूर-दूर तक उड़ान भरूंगी। कोई न कोई स्थान ऐसा अवश्य होगा जहां होटल वाले मिठाइयों को खुला रखे होंगे।

और रानी मक्खी उड़ चली।

बेचारी रानी मक्खी ने दूसरे शहरों का चक्कर काट डाला, हर शहर में होटल वालों ने मिठाइयों को मक्खियों से बचाने के लिए पुख्ता इंतजाम किए थे। दूसरे शहरों में तो मिठाइयां कांच की पेटियों के अंदर रखी हुई थीं।

रानी ने सोचा, ’कांच की पेटियों में प्रवेश करना तो अधिक मुश्किल काम है, इसलिए मच्छरदानियों वाले अपने शहर के होटल ही ठीक हैं। यदि किसी मच्छरदानी में घुसने लायक छेद होगा तो मिठाइयों का रस पीने का मौका मिल ही जाएगा।

वह अपने शहर लौट गई लेकिन बहुत कोशिश के बाद भी उसे मिठाइयों तक पहुंचने का मौका नहीं मिल रहा था। वह सूख कर कांटा हो गई। उस की कमजोरी की सीमा न रही। एक दिन तो ऐसी दशा हुई कि वह चक्कर खा कर दन्न से जमीन पर गिर गई और बेहोश हो गई। थोड़ी देर बाद जब उसे होश आया तो पाया कि दो मक्खियां दाएं-बाएं बैठी हैं और अपने पंख हिला हिला कर उसे हवा झल रही हैं।

वे दूसरे महल्ले की मक्खियां थीं। उन्होंने रानी से पूछा, ’क्या नाम है तुम्हारा? यहां बेहोशी की हालत में कैसे गिर पड़ी?

रानी मक्खी ने अपना पूरा परिचय देकर कहा, ’तुम्हारे के हवा झलने से मैं होश में आई हूं। बहुत-बहुत शुक्रिया।’ अब कृपया मेरे लिए मिठाई के रस का भी इंतजाम कर दो।

’क्यों नहीं’, दोनों मक्खियां बोली, ’हम एक ऐसे होटल को जानते हैं, जहां मिठाइयों को मच्छरदानी के अंदर रखा गया है लेकिन वहां रसगुल्ला वाली मच्छरदानी के हजारों छेदों में से सिर्फ एक छेद कुछ बड़ा है। हम रोज उसी बड़े छेद में से अंदर घुस जाती है और रसगुल्ले का रस पी कर आती हैं।

‘अरे, यह तो बड़ा सरल है’, रानी चिहुंक पड़ी।

’यह सही है कि हम रोज रसगुल्ले का रस पीते हैं मगर कितना? बिल्कुल थोड़ा सा। मन पर बड़ा काबू रखना पड़ता है। किसी भी दिन अगर ज्यादा रस पी गए तो पेट फूलने के कारण मच्छरदानी के छेद में से बाहर ही न निकल सकेंगी। अंदर ही फंसी रह जाएंगी और इसमें जान का खतरा है’, उन में एक मक्खी बोली।

यह सुन कर रानी मक्खी कहने लगी, ’थोड़ा थोड़ा सही मगर रसगुल्ले का रस मिलता तो रोज है न? क्या तुम दोनों मुझे हमेशा अपने हाथ रखोगी? इस तरह रानी मक्खी उन मक्खियों की सहेली बन गई। फिर तीनों मक्खियों ने उड़ान भरी और होटल में जा पहुंची।

होटल में एक बर्तन में बड़े-बड़े रसगुल्ले रखे थे और उसे मच्छरदानी से ढंक दिया गया था। थोड़ी देर बाद तीनों मक्खियां छेद से अंदर पहुंच कर रसगुल्लों के उपर बैठ गई।

वे तीनों रसगुल्ले का रस चूसने लगीं। ज्यों-ज्यों पीती गई त्यों-त्यों उन के पेट फूलते गए। मगर रानी मक्खी का पेट इतना फूला , इतना फूला कि स्वयं रानी छोटी ओर पेट बड़ा हो गया। बस यही मुसीबत का कारण बन गया।

मच्छरदानी के बड़े छेद में से वे दोनों मक्खियां तो आसानी से आरपार हो गई पर रानी मक्खी छेद में फंस कर रह गई। उसकी सिट्टी पिट्टी गुम गई।

दोनों मक्खियों ने कहा, रानी बहन, हम ने तुम्हें पहले ही सावधान किया था कि ज्यादा रस मत पीना। तुम ने अपने मन पर बिल्कुल काबू न रखा। तुम रसगुल्ले का रस पीती गई और अब देखो, क्या दशा है। जो अपने मन पर काबू नहीं रखता। उस का सर्वनाश हो कर रहता है। अब तुम यहीं तड़पती रहो, हम चले।

रानी मक्खी को रोती बिलखती छोड़ कर दोनों मक्खियां न जाने कहां उड़ गई। बहुत देर तक रानी मच्छरदानी के छेद के इस पार या उस पास निकलने की कोशिश करती रही। इस से उस का कोमल पेट छेद के धागों में और भी ज्यादा फंस गया।

तभी एक ग्र्राहक होटल में रसगुल्ला खरीदने आया। होटल के कर्मचारी ने मच्छरदानी को निकाला और उसे लपेट कर एक कोने में रख दिया। मच्छरदानी को लपेटने से रानी मक्खी का पेट फट गया और वह सदा के लिए इस संसार से चली गई। नरेंद्र देवांगन(उर्वशी)

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