

नदियां युगों-युगों से पृथ्वी पर बह रही हैं। धरती पर सुंदर चित्र रचती नदियां आनंद का उत्सव हैं। जीवन में प्राणों का संचार करती नदियों की कल-कल मनोहर ध्वनि अशांत चित्त और अधीर मन को शांति और धैर्य की समिधा प्रदान करती हैं। नदियां धरा की जीवन रेखाएं हैं, जो सुधा सम निर्मल शीतल जल से मानव तन-मन को संतृप्ति दे सुख का प्रसाद वितरित करती हैं। धरती की खुशहाली और बहुरंगी जीवन शुभ सरिताओं की देन है। निश्चित रूप से लोक जीवन में नदियों का महत्व एवं उपयोगिता निर्विवाद सर्वस्वीकार्य है। नदियां न केवल मनुष्यों के लिए अपितु पशु-पक्षियों एवं पेड़-पौधों के पोषण एवं विकास के लिए आवश्यक है। समस्त प्राणिजगत का जीवन यापन धरती पर निर्भर है और धरती की हरीतिमा नदियों पर आश्रित हैं। यदि नदियां न हों तो जल बिना धरती की तरलता छिन जाएगी, उर्वरता का ह्रास होगा, न जंगल बचेंगे और न ही जीवन। तब शुष्क बंजर धरा अनुपयोगी और निरर्थक हो जाएगी।
धरती को स्वस्थ, सुवासित, सुफला और समृद्ध बनाती हैं नदियां। कह सकते हैं नदियां वसुधा का शृंगार हैं। सदानीरा सरिताएं धरती की देह को जल से तृप्त कर जीवों के लिए फसलों का उपहार भेंट करती हैं। वस्तुत: नदियां पृथ्वी की धमनियां हैं। सतत प्रवहमान नदियां लोकजीवन में खुशियां, उपलब्धियां और समृद्धि का द्वार खोलती हैं। नदियों का संरक्षण अत्यावश्यक है ताकि धरती पर जीवन नर्तन करता रहे, इसीलिए प्रत्येक वर्ष 14 मार्च को नदियों के लिए अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई दिवस का आयोजन कर जन जागरूकता का कार्य किया जा रहा है।
किसी देश के निवासियों की सोच, दृष्टि और भावी योजना को समझना हो तो वहां की नदियों को देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। नदियों का स्वस्थ और सदा जल प्रवाही होना संकेत करता है कि वहां का लोक जीवन का नदियों से आत्मीय एवं मधुर सम्बन्ध है, और वह समाज भविष्य के लिए स्वस्थ नदियों को धरोहर के रूप में भावी पीढ़ियों को सौंपने की जिम्मेदारी एवं कर्तव्य से परिचित हैं और यदि किसी देश की नदियां प्रदूषित हैं, नगरीय सीवेज तथा औद्योगिक एवं कृषि अपशिष्ट संवहन का माध्यम बन अपना नैसर्गिक रूप खोकर गंदा नाला बनती जा रही हैं, तो कहा जा सकता है कि वहां का समाज जल के महत्व से अनभिज्ञ, आत्मकेंद्रित और निरा स्वार्थी है जो भोगवादी भावभूमि पर भावी संकट से अनजान केवल वर्तमान जी रहा है।
अगर वैश्विक परिदृश्य पर दृष्टिपात करें तो हमें उक्त दोनों प्रकार के दृश्य दिखाई पड़ते हैं।अपवाद स्वरूप कुछेक नदियों को छोड़ आज दुनिया भर की नदियां संकट में हैं। न केवल अनियोजित खनन, तटबंधों एवं प्रवाह मार्ग पर अवैध कब्जे एवं निर्माण, धार्मिक गतिविधियों से उपजे कूड़े का बिखराव अपितु विनाशकारी बड़े बांधों के निर्माण से नदियाें का सहज जीवन बाधित हुआ है। दैनंदिन कार्य-व्यवहार से उपजा कूड़ा-करकट, उद्योगों का अपशिष्ट, अस्पतालों के रोगियों की प्रयुक्त प्लास्टर, पट्टी-रुई, इंजेक्शन आदि सामग्री और नगरों के बिना शोधित सीवेज का लगातार नदियों में गिरना तथा मानव द्वारा नदियों की अनदेखी के चलते नदियां आसन्नमरण हैं। नदियों की सांसें थम रही हैं, हर वर्ष कहीं न कहीं कोई नदी अपना स्वरूप खो नाले में बदल मर रही है। हम देखते-सुनते भी अनजान बने हुए जीये जा रहे हैं।
नदियां स्वस्थ हों, हंसे-मुसकुरायें, धरती पर उनका मोहक कलरव संगीत गूंजता रहे, जल-जीवों की अठखेलियां नवल चित्र रचती रहें, इसीलिए प्रत्येक वर्ष 14 मार्च को नदियों के लिए अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई दिवस मनाया जाता है। नदी कार्रवाई दिवस मनाने का उद्देश्य आमजन को नदियों के महत्व एवं संरक्षण, प्रदूषण से नदियों को बचाने, नदी जल परियोजना के हानिकारक बड़े बांधों के विरुद्ध जागरूकता का प्रसार करने, पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा, पशु-पक्षियों एवं मानव को मीठे जल की उपलब्धता सुनिश्चित करने और प्रत्येक व्यक्ति को नदी-प्रेमी बनाने हेतु प्रयास करना है। बड़े बांधों से होने वाले नुकसानों, पारिस्थितिकी तंत्र की हानि एवं खाद्य शृंखला टूटने, नदियों के सतत प्रवाह बाधित होने से लोकजीवन में पड़ने वाले असर से बचाने हेतु दुनिया के 20 देशों के प्रतिनिधियों ने 1997 में ब्राजील में बैठक कर नदियों के संरक्षण हेतु कार्रवाई करने पर बल दिया तथा प्रत्येक वर्ष 14 मार्च को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नदी कार्रवाई दिवस मनाकर जन जागरण करने का संकल्प लिया। तब 14 मार्च, 1998 को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहला आयोजन किया गया।
वर्तमान में सम्पूर्ण विश्व में इस अवसर पर थीम आधारित छोटे-बड़े हजारों आयोजन करके नदियों को बचाने के लिए व्यापक स्तर पर रणनीतिक साझेदारी के साथ कार्य किया जा रहा है। वर्ष 2025 में थीम थी - हमारी नदियां, हमारा भविष्य, जबकि 2026 में आयोजन हेतु 'नदियों की रक्षा करें, लोगों की रक्षा करें' केंद्रीय विषय चुना गया है, जो न केवल प्रासंगिक और समीचीन बल्कि नदियों के संरक्षण, शुचिता एवं सतत प्रवाह को बनाये रखने के लिए प्रेरित करने वाला भी है। उल्लेखनीय है कि नदियां मीठे जल का प्राकृतिक स्रोत है जो धरती पर उपलब्ध कुल जल का 1 प्रतिशत है। नदियां हिमनदों, पहाड़ों और बड़ी झीलों से निकल सागरों में मिलती हैं। ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमनद ग्लेशियर अधिक पिघल कर लगातार सिकुड़ते जा रहे हैं जो भयावह संकट का संकेतक है। मानव सभ्यता एवं संस्कृति का जन्म एवं विकास नदियों के किनारों पर हुआ। नदियों ने झीलों, घाटियों, उपत्यकाओं एवं आर्द्रभूमियों का निर्माण किया। धरती के फेफड़े जंगलों को विकसित किया। सर्वाधिक नदियों वाली भूमि बांग्लादेश में नारा दिया जाता है- नदियों को बचाओ, देश को बचाओ, जो उनके नदी प्रेम का परिचायक है।
भारत नदियों से समृद्ध है, यहां नदियां वंदनीय एवं पूजनीय हैं। 2008 में राष्ट्रीय नदी घोषित गंगा को मातृवत सम्मान दिया जाता है। देश की सभी नदियां पश्चिम से पूर्व को प्रवाहित हो बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं, जबकि नर्मदा तथा ताप्ती नदियां पूर्व से पश्चिम को बहते हुए अरब सागर में मिलती हैं। गण्डक नदी में भगवान विष्णु का स्वरूप शालिग्राम और केन नदी, बांदा में शजर पत्थर पाये जाते हैं। शजर पत्थरों के अंदर पशु-पक्षियों एवं वृक्षों की आकृतियां उभरी होती हैं। नदियों के तटों पर मेलों का आयोजन होता है। नदियों को साफ-स्वच्छ बनाने के लिए नमामि गंगे, नदी उत्सव और स्वच्छ भारत अभियान संचालित हैं। नदी कार्रवाई दिवस के अवसर पर जागरूकता हेतु हम नदियों पर आधारित लघु वृत्तचित्र प्रदर्शित कर सकते हैं। विद्यालयों में वाद-विवाद, भाषण, एकांकी, पोस्टर प्रतियोगिता का आयोजन किया जा सकता है। नदी तटों पर सम्मान समारोह आयोजित कर नदियों के लिए काम करने वाले व्यक्तियों एवं संस्थाओं को सम्मानित कर प्रेरक वातावरण बना सकते हैं। मुझे लगता है, नदियों की खुशहाली के लिए युवाओं की सहभागिता आवश्यक है। विविध कार्यक्रमों के माध्यम से जन जागरण करते हुए हम नदियों को जीवन दें क्योंकि नदियों से हम और हमारी दुनिया बचेगी।
प्रमोद दीक्षित मलय