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आईआईटी गुवाहाटी ने विकसित किया दिमाग जैसी क्षमता वाला उपकरण
इमेज प्रोसेसिंग में 500 गुना कम ऊर्जा की खपत, चेहरे की पहचान में 90 प्रतिशत सटीकता हासिल
गुवाहाटी:
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने आईआईटी खड़गपुर के सहयोग से एक ऐसा अत्याधुनिक उपकरण विकसित किया है, जो मानव मस्तिष्क की तरह दृश्य जानकारी को पहचानने, उसे याद रखने और संसाधित करने की क्षमता रखता है। यह प्रकाश-संवेदनशील उपकरण पारंपरिक MXene-आधारित उपकरणों की तुलना में इमेज प्रोसेसिंग के दौरान 500 गुना कम ऊर्जा की खपत करता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह तकनीक भविष्य में चेहरे की पहचान, रोबोटिक विजन, यातायात निगरानी और स्मार्ट कंप्यूटिंग के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
कैमरा, मेमोरी और प्रोसेसर का काम एक ही उपकरण में
आमतौर पर इलेक्ट्रॉनिक इमेज प्रोसेसिंग प्रणाली में कैमरा तस्वीर कैप्चर करता है, मेमोरी उसे सुरक्षित रखती है और प्रोसेसर तस्वीर का विश्लेषण करके वस्तुओं या चेहरों की पहचान करता है। इन अलग-अलग इकाइयों के बीच लगातार डेटा का आदान-प्रदान होता है, जिससे ऊर्जा की खपत बढ़ती है और प्रसंस्करण में अतिरिक्त समय लग सकता है। इसके विपरीत, मानव मस्तिष्क पहले से संचित अनुभव और जानकारी के आधार पर किसी परिचित वस्तु को तेजी से पहचान सकता है। आईआईटी के शोधकर्ताओं ने इसी प्राकृतिक प्रक्रिया से प्रेरणा लेकर एक ऐसा उपकरण बनाया है, जिसमें दृश्य जानकारी को महसूस करने, याद रखने और संसाधित करने की क्षमताओं को एक ही मंच पर एकीकृत किया गया है। शोध के प्रमुख लेखक और आईआईटी गुवाहाटी के भौतिकी विभाग के प्रोफेसर पी.के. गिरि ने उदाहरण देते हुए बताया कि इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली में सेब की तस्वीर को पहचानने के लिए कैमरे से प्राप्त डिजिटल जानकारी का प्रोसेसर विश्लेषण करता है। वहीं, मानव मस्तिष्क रंग, आकार और पहले से उपलब्ध जानकारी के आधार पर सेब को पहचान लेता है। नई तकनीक इसी तरह की कार्यप्रणाली को इलेक्ट्रॉनिक उपकरण में विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
MXene और P3HT सामग्री से तैयार किया गया उपकरण
इस अत्यंत पतले उपकरण को बनाने के लिए शोधकर्ताओं ने दो विशेष सामग्रियों का इस्तेमाल किया है। इनमें पहली MXene नैनोशीट्स है, जो विद्युत का संचालन करने वाली द्विविमीय सामग्री है। दूसरी P3HT नामक ऑर्गेनिक सेमीकंडक्टर है, जो प्रकाश पड़ने पर विद्युत आवेश उत्पन्न कर सकता है। जब इन दोनों सामग्रियों को एक-दूसरे के संपर्क में लाया जाता है, तो प्रकाश के कारण उत्पन्न विद्युत आवेश उनके बीच की सतह पर अलग हो जाते हैं और लंबे समय तक अलग बने रहते हैं। इसके कारण प्रकाश स्रोत बंद होने के बाद भी उपकरण में प्रतिक्रिया बनी रहती है। यह क्षमता किसी वस्तु को देखने के बाद उसकी जानकारी मस्तिष्क में बने रहने जैसी प्रक्रिया से मिलती-जुलती है। इस तकनीक की एक अन्य खासियत यह है कि बार-बार प्रकाश संकेत मिलने पर इसकी प्रतिक्रिया मजबूत होती जाती है। प्रयोगों में दूसरे प्रकाश संकेत के प्रति उपकरण की प्रतिक्रिया पहले संकेत की तुलना में 180 प्रतिशत अधिक मजबूत दर्ज की गई। शोधकर्ताओं ने इसे बार-बार उत्तेजना मिलने पर तंत्रिका कोशिकाओं में होने वाली सीखने की प्रक्रिया से मिलता-जुलता बताया है।
चेहरे की पहचान में 90 प्रतिशत सटीकता
शोधकर्ताओं ने उपकरण की क्षमता का परीक्षण चेहरे की पहचान और यातायात दृश्यों के विश्लेषण में किया। प्रयोगशाला परीक्षणों में इसने चेहरे की पहचान में 90 प्रतिशत और यातायात दृश्यों के विभाजन एवं विश्लेषण में 85 प्रतिशत सटीकता हासिल की। यातायात दृश्यों के विभाजन की प्रक्रिया में सड़क पर मौजूद अलग-अलग वस्तुओं, वाहनों और अन्य तत्वों की पहचान कर उन्हें अलग-अलग श्रेणियों में बांटा जाता है। ऐसी क्षमता भविष्य में स्मार्ट ट्रैफिक सिस्टम, रोबोटिक नेविगेशन और स्वचालित प्रणालियों के विकास में उपयोगी हो सकती है। कम ऊर्जा की खपत के कारण इस तकनीक से ऐसे कंप्यूटिंग सिस्टम विकसित करने की संभावनाएं भी बढ़ती हैं, जिन्हें लगातार दृश्य जानकारी का विश्लेषण करना पड़ता है। हालांकि, अभी प्राप्त परिणाम प्रयोगशाला परीक्षणों पर आधारित हैं। बड़े पैमाने पर व्यावहारिक इस्तेमाल के लिए इसकी क्षमता और विश्वसनीयता का आगे परीक्षण करना होगा।
कम लागत वाली तकनीक से विकास
आईआईटी गुवाहाटी के अनुसार, इस उपकरण को कम लागत वाली सॉल्यूशन-प्रोसेसिंग तकनीक के माध्यम से विकसित किया गया है। कम ऊर्जा की जरूरत और एक ही उपकरण में कई कार्यों को समाहित करने की क्षमता इसे भविष्य की ऊर्जा-कुशल इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों के लिए उपयोगी बना सकती है। इस शोध के निष्कर्ष प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका Carbon में प्रकाशित हुए हैं। शोध दल में आईआईटी गुवाहाटी के प्रोफेसर पी.के. गिरि के साथ संजय सूर रॉय, डॉ. संजू नंदी, देबब्रत साहू, गरिमा चौधरी और प्रोफेसर एम. मेय्यप्पन शामिल हैं। आईआईटी खड़गपुर से शाश्वत गोस्वामी और प्रोफेसर चंद्रशेखर तिवारी ने भी शोध में योगदान दिया है। यह उपलब्धि कम ऊर्जा में दृश्य जानकारी का विश्लेषण करने वाली नई पीढ़ी की इलेक्ट्रॉनिक तकनीकों के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। यदि आगे के परीक्षणों में इसके परिणाम व्यावहारिक परिस्थितियों में भी प्रभावी साबित होते हैं, तो यह कृत्रिम दृष्टि और स्मार्ट कंप्यूटिंग प्रणालियों को अधिक ऊर्जा-कुशल बनाने में मदद कर सकता है।

