US Fed ने 3 साल बाद बढ़ाई Interest Rate, शेयर बाजार में गिरावट

महंगाई पर लगाम के लिए 0.25% की बढ़ोतरी, डाओ जोंस 631 अंक टूटा
ब्याज दर बढ़ाने के फैसले के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में फेड चेयरमैन केविन वार्श।
ब्याज दर बढ़ाने के फैसले के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में फेड चेयरमैन केविन वार्श।Evan Vucci | Reuters
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न्यूयॉर्क: अमेरिका के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने तीन साल से ज्यादा समय बाद पहली बार ब्याज दर बढ़ाने का फैसला किया है। महंगाई के लगातार ऊंचे स्तर पर बने रहने के बीच फेड ने बुधवार को फेडरल फंड्स रेट में 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी की। इसके बाद ब्याज दर का लक्ष्य दायरा 3.75 से 4 प्रतिशत हो गया। फेड का यह फैसला बाजार की व्यापक उम्मीद के अनुरूप था, लेकिन इसके बाद अमेरिकी शेयर बाजार में गिरावट देखने को मिली।

12-0 से हुआ फैसला

फेडरल ओपन मार्केट कमेटी (FOMC) ने ब्याज दर बढ़ाने का फैसला 12-0 के मत से लिया। फेड ने कहा कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था की गतिविधियां मजबूत गति से बढ़ रही हैं। घरेलू खर्च में मजबूती बनी हुई है, उत्पादकता वृद्धि मजबूत है और पूंजी निवेश भी अच्छा है। वहीं रोजगार में बढ़ोतरी श्रमबल की वृद्धि के अनुरूप बनी हुई है और बेरोजगारी दर में ज्यादा बदलाव नहीं हुआ है।

हालांकि, फेड ने साफ किया कि महंगाई अभी भी ऊंची है। केंद्रीय बैंक के मुताबिक मौजूदा ब्याज दर बढ़ोतरी से महंगाई को उसके 2 प्रतिशत के लक्ष्य की ओर जल्द वापस लाने में मदद मिलेगी। फेड चेयरमैन केविन वार्श ने भी कहा कि गर्मियों के दौरान सामने आए महंगाई के आंकड़ों में ऐसी कोई महत्वपूर्ण सुधार की प्रवृत्ति नहीं दिखी, जिससे केंद्रीय बैंक अपने रुख में बदलाव करे।

इस साल एक और बढ़ोतरी का संकेत

फेड के नए आर्थिक अनुमानों से आगे भी ब्याज दर बढ़ने की संभावना का संकेत मिला है। Reuters के अनुसार, 18 में से 16 फेड अधिकारियों ने 2026 के अंत तक कम से कम एक और 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी का अनुमान जताया है। नए अनुमानों में साल के अंत तक फेडरल फंड्स रेट का दायरा 4 से 4.25 प्रतिशत रहने का अनुमान है। 2027 के अंत के लिए भी यही दायरा अनुमानित किया गया है।

फेड ने 2026 के लिए महंगाई के अपने अनुमान को भी बढ़ाया है। Reuters के मुताबिक, व्यक्तिगत उपभोग व्यय (PCE) मूल्य सूचकांक के आधार पर महंगाई का अनुमान 3.7 प्रतिशत किया गया है, जो जून के 3.6 प्रतिशत के अनुमान से ज्यादा है। फेड के अनुमान के अनुसार महंगाई के 2 प्रतिशत के लक्ष्य तक लौटने में पहले के अनुमान से अधिक समय लग सकता है।

ब्याज दर बढ़ते ही फिसला अमेरिकी बाजार

फेड के फैसले के बाद अमेरिकी शेयर बाजार में गिरावट दर्ज की गई। कारोबार के अंत में डाओ जोंस 631.33 अंक यानी 1.21 प्रतिशत गिरकर 51,461.78 पर बंद हुआ। S&P 500 में 0.44 प्रतिशत की गिरावट रही और यह 7,552.14 पर बंद हुआ। वहीं Nasdaq 3.15 अंक यानी 0.01 प्रतिशत गिरकर 25,978.43 पर बंद हुआ।

Reuters के मुताबिक, फेड के फैसले से पहले तीनों प्रमुख अमेरिकी सूचकांक बढ़त में कारोबार कर रहे थे। हालांकि, फेड के फैसले और चेयरमैन वार्श की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद बाजार में दबाव बढ़ा। अमेरिकी ट्रेजरी की 2-वर्षीय बॉन्ड यील्ड भी फेड के फैसले के बाद दो साल से ज्यादा के उच्च स्तर पर पहुंच गई।

महंगाई के पीछे तेल और अन्य दबाव

अमेरिका में महंगाई पर ऊर्जा कीमतों का दबाव भी बना हुआ है। Al Jazeera की रिपोर्ट के मुताबिक, अगस्त में अमेरिकी उपभोक्ता कीमतों में 0.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, जो चार महीनों में सबसे ज्यादा थी। सालाना आधार पर महंगाई 3.4 प्रतिशत रही। ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी के अलावा अमेरिकी टैरिफ और AI से जुड़े पूंजी निवेश को भी कीमतों पर दबाव बढ़ाने वाले कारकों में शामिल किया गया है।

हालांकि, 16 सितंबर को अमेरिकी कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आई। Reuters के अनुसार, WTI क्रूड 3.2 प्रतिशत और Brent क्रूड 2.7 प्रतिशत नीचे बंद हुआ। इसके बावजूद हाल की ऊर्जा कीमतों में तेजी ने अमेरिकी महंगाई को लेकर चिंता बढ़ाई है।

फेड का अगला रुख अब महंगाई, रोजगार और आर्थिक गतिविधियों से जुड़े नए आंकड़ों पर निर्भर करेगा। मौजूदा फैसले के साथ केंद्रीय बैंक ने यह संकेत जरूर दिया है कि महंगाई को 2 प्रतिशत के लक्ष्य की ओर लाने को वह अपनी प्राथमिकता बनाए हुए है।

भारत पर क्या होगा असर?

अमेरिकी फेड के ब्याज दर बढ़ाने का असर भारत के वित्तीय बाजारों पर भी पड़ सकता है। ऊंची अमेरिकी ब्याज दरों से डॉलर को मजबूती मिल सकती है और उभरते बाजारों से विदेशी निवेश के बाहर जाने का दबाव बढ़ सकता है। इससे भारतीय रुपये पर भी दबाव आ सकता है। Reuters के मुताबिक, फेड के फैसले से पहले ही रुपये पर दबाव बना हुआ था और 16 सितंबर को यह 95.95 रुपये प्रति डॉलर पर बंद हुआ। कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भी रुपये के लिए अतिरिक्त दबाव का कारण बनी हुई हैं।

भारतीय शेयर बाजार के लिए भी अमेरिकी दरों का असर महत्वपूर्ण है। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बढ़ने पर विदेशी निवेशकों के लिए अमेरिकी परिसंपत्तियां अपेक्षाकृत आकर्षक हो सकती हैं, जिससे भारत जैसे उभरते बाजारों में विदेशी निवेश प्रभावित हो सकता है। हालांकि, बाजार पर असर इस बात पर भी निर्भर करेगा कि फेड आगे ब्याज दरों को लेकर कितना सख्त रुख अपनाता है।

RBI पर इसका सीधा मतलब यह नहीं है कि वह भी ब्याज दर बढ़ाएगा। भारतीय रिजर्व बैंक का फैसला देश में महंगाई, आर्थिक वृद्धि, रुपये की स्थिति और घरेलू परिस्थितियों को ध्यान में रखकर होगा। इसलिए फेड का फैसला भारत के लिए एक बाहरी वित्तीय दबाव जरूर बढ़ाता है, लेकिन RBI के अगले कदम को इससे सीधे तय नहीं किया जा सकता।

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