

अंजलि भाटिया
अदालतों में बढ़ते सरकारी मुकदमों और लंबित मामलों के बोझ को देखते हुए केंद्र सरकार ने अब स्पष्ट संदेश दिया है—अनावश्यक मुकदमेबाजी पर रोक लगेगी और फैसलों के क्रियान्वयन में देरी बर्दाश्त नहीं होगी। आज भारत मंडपम में सरकारी मुकदमों के कुशल और प्रभावी प्रबंधन पर राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया।
सम्मेलन का फोकस साफ था—विकसित भारत @2047” के लक्ष्य को पाने के लिए मुकदमेबाजी की कार्यप्रणाली को अनुशासित और जवाबदेह बनाना। बैठक में केंद्रीय सचिवों, वरिष्ठ अधिकारियों और शीर्ष विधि अधिकारियों ने खुलकर माना कि कई मामलों में सरकार खुद ही मुकदमों की संख्या बढ़ाने का कारण बनती है। एक जैसी कानूनी स्थिति होने के बावजूद अलग-अलग मंत्रालयों का अलग रुख, अपील को ‘डिफॉल्ट विकल्प’ मान लेना और अदालत के आदेशों के पालन में देरी,ये प्रमुख कमियां चिन्हित की गईं।
सेवा, पेंशन और रोजगार मामलों में बार-बार एक जैसे विवाद सामने आने पर चिंता जताई गई। तय हुआ कि अब अपील दाखिल करने से पहले स्पष्ट और सख्त मानदंड अपनाए जाएंगे। हर विभाग में मुकदमों की निगरानी के लिए एक जिम्मेदार अधिकारी नियुक्त करने का सुझाव दिया गया, ताकि समन्वय की कमी से नए विवाद न खड़े हों।
अवसंरचना और भूमि मुआवजा मामलों में बढ़ती कानूनी लड़ाइयों और ब्याज के बोझ को लेकर भी गंभीर मंथन हुआ। तकनीकी अनुबंधों में शुरुआती स्तर पर कानूनी जांच की कमी और मध्यस्थीय फैसलों को लगभग रूटीन में चुनौती देने की प्रवृत्ति पर सवाल उठे। साफ संकेत दिया गया कि अब हर चुनौती से पहले उसके कानूनी और वित्तीय असर का ठोस मूल्यांकन होगा।
सम्मेलन में वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) और अदालत जाने से पहले समझौते की प्रक्रिया को मजबूती से लागू करने पर जोर दिया गया। ताकि विवाद शुरुआती चरण में ही सुलझें, अदालतों तक न पहुंचें।
सरकार ने स्पष्ट किया कि जिम्मेदार और अनुशासित मुकदमेबाजी ही आगे की राह है। अनावश्यक अपीलें कम होंगी, अदालत के आदेशों का समय पर पालन होगा और मंत्रालयों के बीच एक समान कानूनी रुख अपनाया जाएगा। माना जा रहा है कि यह पहल न सिर्फ अदालतों का बोझ घटाएगी, बल्कि कारोबार सुगमता बढ़ाएगी और सरकारी कामकाज में पारदर्शिता व भरोसा भी मजबूत करेगी।