प्रेस्क्रिप्शन चलता रहा, ज़िंदगी थम गई

डॉ. सौरव घोष की मार्मिक दास्तान
प्रेस्क्रिप्शन चलता रहा, ज़िंदगी थम गई
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प्रसेनजीत, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : दक्षिण कोलकाता के नाकतला, रामगढ़ या बाघाजतीन की संकरी गलियों में कभी-कभी एक अनदेखा-सा आदमी दिख जाता है। बिखरे बाल, लंबी दाढ़ी, मैले कपड़े। लोग नज़रें फेर लेते हैं। अधिकांश के लिए वह सिर्फ़ एक मानसिक रूप से असंतुलित भटकता व्यक्ति है। लेकिन इस उपेक्षित शरीर के भीतर छुपी है एक टूटी हुई पहचान—डॉ. सौरव घोष।

हाथ में काग़ज़ और कलम आते ही मानो वक्त पलट जाता है। आंखों में चमक लौट आती है। वह बिना रुके दवाइयों के नाम लिखते जाते हैं—टैबलेट, इंजेक्शन, डोज़। हैरानी की बात यह कि सब कुछ बेहद सटीक। पर्ची के नीचे ज़रूर लिखा होता है—डॉ. सौरव घोष, डिग्री और रजिस्ट्रेशन नंबर। जैसे अपनी पहचान अब भी थामे हुए हों। हाल ही में एक रिपोर्ट बताती है कि आज का यह भटकता चेहरा कभी एनआरएस मेडिकल कॉलेज का मेधावी छात्र था। 2003 के आसपास उन्होंने एमबीबीएस पास किया। उनके परिवार भी प्रतिभा से भरा था। पिता रेलवे कर्मचारी और शिक्षक थे। बहन और छोटे भाई—दोनों थे बेहद मेधावी।

लेकिन नियति ने सब कुछ छीन लिया। तीनों भाई-बहन मानसिक बीमारी की चपेट में आए। बहन और भाई की मौत हो चुकी है, माता-पिता भी गुजर गए। लगातार सदमों ने सौरव को तोड़ दिया। कुछ समय कार्डियक सर्जन के रूप में काम करने के बाद उनका करियर थम गया। आज वे अपने ही घर के एक गंदे कमरे में अकेले रहते हैं। दीवारों पर मेडिकल कॉलेजों के नाम, अपनी डिग्री और रजिस्ट्रेशन नंबर—यादों से जूझने की कोशिश।

पड़ोस के कुछ लोग आज भी इंसानियत निभा रहे हैं। कोई खाना देता है, कोई हालचाल पूछता है। इस बीच हाल ही में उम्मीद की एक खबर सामने आई है। डॉ. घोष के कुछ बैचमेट्स फरिश्ता बनकर हस्तक्षेप कर डॉ. सौरव को कोलकाता के प्रतिष्ठित पैवलॉव मानसिक अस्पताल में भर्ती कराया है। फिलहाल वह वहां विशेषज्ञों की निगरानी में इलाजरत हैं। हालांकि कलम अब भी चलती है। क्योंकि कहीं न कहीं, डॉ. सौरव घोष आज भी एक डॉक्टर हैं।

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