विधानमंडलों की गरिमा और जनता की आवाज़ के अंतिम संरक्षक होते हैं पीठासीन अधिकारी : सी.पी. राधाकृष्णन

राधाकृष्णन ने कहा कि यह सम्मेलन राष्ट्रमंडल लोकतंत्रों को जोड़ने वाली सामूहिक सद्भावना और साझा उद्देश्य की भावना को प्रतिबिंबित करता है।
विधानमंडलों की गरिमा और जनता की आवाज़ के अंतिम संरक्षक होते हैं पीठासीन अधिकारी : सी.पी. राधाकृष्णन
Published on

नयी दिल्ली : राज्यसभा के सभापति और भारत के उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने कहा कि पीठासीन अधिकारी विधान मंडलों की गरिमा और जनता की आवाज़ के अंतिम संरक्षक होते हैं। राष्ट्रमंडल देशों के संसद अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों के सम्मान में आयोजित भोज को संबोधित करते हुए राधाकृष्णन ने कहा कि यह सम्मेलन राष्ट्रमंडल लोकतंत्रों को जोड़ने वाली सामूहिक सद्भावना और साझा उद्देश्य की भावना को प्रतिबिंबित करता है। भारतीय सभ्यता की सोच का उल्लेख करते हुए उन्होंने संवाद, सहयोग और पारस्परिक सम्मान के माध्यम से साथ आगे बढ़ने की आवश्यकता पर बल दिया।

अतिथियों का स्वागत करते हुए सभापति ने कहा कि संविधान सदन में राष्ट्रमंडल देशों के प्रतिष्ठित संसदीय नेताओं की मेजबानी करना गर्व का विषय है। उन्होंने कहा कि यह ऐतिहासिक भवन पिछले साढ़े सात दशकों से अधिक समय से भारत की सशक्त और जीवंत संसदीय लोकतांत्रिक परंपरा का प्रतीक रहा है।

पीठासीन अधिकारियों की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि विविध विचारों के बीच शालीनता और गरिमा के साथ वाद-विवाद, संवाद और चर्चा को सुचारू रूप से संचालित करना उनकी साझा और प्रमुख जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि भले ही राष्ट्रमंडल देश भौगोलिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से भिन्न हों, लेकिन वे साझा संसदीय मूल्यों और लोकतांत्रिक सिद्धांतों के प्रति सामूहिक प्रतिबद्धता से जुड़े हुए हैं।सभापति ने कहा कि पीठासीन अधिकारी विधानसभाओं की मर्यादा और जनता की अभिव्यक्ति की रक्षा करते हुए स्वतंत्र अभिव्यक्ति और सुव्यवस्थित कार्यवाही के बीच संतुलन बनाए रखते हैं।

भारत की लोकतांत्रिक विरासत की बात करते हुए उन्होंने भारत को “लोकतंत्र की जननी” बताया और कहा कि भारत राष्ट्रमंडल को केवल एक ऐतिहासिक संगठन नहीं, बल्कि समान भागीदारों के बीच सहयोग का एक दूरदर्शी और सशक्त मंच मानता है। उन्होंने कहा कि सीएसपीओसी जैसे मंच संस्थागत अनुभवों, सर्वोत्तम प्रक्रियाओं और विचारों के आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करते हैं, जिससे विधायिकाओं की मजबूती, पारदर्शिता और समावेशिता को बढ़ावा मिलता है।

विदेशी अतिथियों को सहभोजन की भारतीय परंपरा के बारे में राधाकृष्णन ने कहा कि यह समानता, भ्रातृत्व और आपसी अपनत्व का प्रतीक है। संस्कृत मंत्र “सर्वे भवन्तु सुखिनः” का स्मरण करते हुए उन्होंने राष्ट्रमंडल संसदों की इस साझा प्रतिबद्धता को दोहराया कि वे अपने-अपने देशों की जनता के कल्याण और समृद्धि के लिए मिलकर निरंतर कार्य करती रहेंगी।

संबंधित समाचार

No stories found.

कोलकाता सिटी

No stories found.

खेल

No stories found.
logo
Sanmarg Hindi daily
sanmarg.in