मानसून की विदाई के बाद बड़े संकट की आहट!

देश 51% हिस्से में औसत से कम हुई बारिश, कई इलाकों में टूटे 17-20 साल के रिकॉर्ड
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मानसून की विदाई के साथ बढ़ी सूखे की आशंका
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नयी दिल्ली : देश में दक्षिण-पश्चिम मानसून विदा हो चुका है, लेकिन इस बार मानसून अपने पीछे बारिश का बेहद असमान पैटर्न छोड़ गया है। देश के एक बड़े हिस्से में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गयी, जबकि कुछ इलाकों में इतनी ज्यादा बारिश हुई कि कई वर्षों के रिकॉर्ड टूट गये। मौसम विभाग के अनुसार करीब 51 फीसदी भारत में बारिश की कमी दर्ज की गयी है।

मौसम की परिस्थितियों पर असर

मौसम विज्ञानियों के अनुसार इस असमान बारिश का असर खेती, जल संसाधनों और स्थानीय मौसम की परिस्थितियों पर पड़ सकता है। कई क्षेत्रों में कम बारिश के कारण मिट्टी में नमी और जल उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ सकती है। जबकि अत्यधिक बारिश वाले इलाकों में बाढ़, जलभराव और फसलों को नुकसान जैसी समस्याएं सामने आयीं।

कहीं 17 साल में सबसे कम बारिश

इस मानसून की सबसे बड़ी विशेषता बारिश का असमान वितरण रहा। कुछ क्षेत्रों में यह करीब 17 वर्ष के दौरान सबसे कम बारिश के स्तर तक पहुंच गयी। कम बारिश का सीधा असर कृषि क्षेत्र पर पड़ सकता है।

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कुछ इलाकों में इतनी ज्यादा बारिश हुई कि कई वर्षों के रिकॉर्ड टूट गये

कहीं 20 साल की सबसे ज्यादा बारिश

दूसरी तरफ देश के कुछ हिस्सों में मानसून ने सामान्य से काफी ज्यादा बारिश करायी। कुछ इलाकों में बारिश का स्तर करीब 20 वर्षों में सबसे अधिक रहा। लगातार या अत्यधिक बारिश से कई जगहों पर जलभराव, बाढ़ और सड़क एवं अन्य बुनियादी ढांचे को नुकसान जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। इस तरह एक ही मानसून सीजन में देश के अलग-अलग हिस्सों में दो बिल्कुल अलग तस्वीरें देखने को मिलीं—एक तरफ बारिश की कमी और दूसरी तरफ अत्यधिक बारिश।

खेती और पानी पर पड़ सकता है असर

मानसून के असमान वितरण का सबसे बड़ा असर कृषि और जल संसाधनों पर पड़ सकता है। खरीफ फसलों के लिए मानसूनी बारिश बेहद महत्वपूर्ण होती है। जिन इलाकों में बारिश कम हुई, वहां किसानों को सिंचाई के लिए अतिरिक्त पानी की जरूरत पड़ सकती है। जलाशयों और भूजल पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है। जिन क्षेत्रों में बारिश कम हुई है, वहां मिट्टी में पर्याप्त नमी बनाये रखना चुनौती बन सकता है। वहीं अधिक बारिश वाले क्षेत्रों में खेतों में पानी भरने से फसलों को नुकसान की आशंका रहती है। हालांकि इसका वास्तविक असर स्थानीय स्तर पर बारिश, जलाशयों की स्थिति, भूजल और फसल पैटर्न सहित कई कारकों पर निर्भर करेगा।

लेकिन चुनौती अभी बाकी

मानसून की विदाई के साथ बारिश का मौसम भले ही समाप्त हो गया हो, लेकिन इसके प्रभाव आने वाले महीनों में दिखाई दे सकते हैं। जिन क्षेत्रों में कम बारिश हुई है, वहां जल प्रबंधन और सिंचाई की योजना महत्वपूर्ण होगी। वहीं अत्यधिक बारिश वाले क्षेत्रों में बाढ़ और जलभराव से हुए नुकसान का आकलन और पुनर्वास बड़ी चुनौती हो सकता है। इस बार मानसून ने एक बार फिर यह दिखाया है कि केवल देशभर में कुल बारिश का आंकड़ा पर्याप्त नहीं होता। बारिश कब, कहां और कितनी हुई, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। देश के 51 फीसदी हिस्से में बारिश की कमी और कुछ क्षेत्रों में रिकॉर्ड बारिश का यह अंतर आने वाले समय में अलग-अलग क्षेत्रों के लिए अलग तरह की चुनौतियां पैदा कर सकता है।

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