नई दिल्लीः आधुनिक भारत की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी और बदलते सामाजिक विमर्श के बीच, भारत मंडपम में 17 से 25 जनवरी तक गूंजती रही राम कथा की वाणी किसी साधारण धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं थी। प्रख्यात संत और सनातन धर्म के प्रमुख प्रवक्ता मोरारी बापू की यह नौ दिवसीय कथा “मानस सनातन धर्म” आस्था, दर्शन और चेतना का ऐसा संगम बनी, जिसने श्रोताओं को आत्ममंथन के लिए प्रेरित किया। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर संपन्न यह कथा प्रतीकात्मक रूप से भारत की सनातन चेतना को लोकतांत्रिक मूल्यों से जोड़ती दिखाई दी।
वेदों से लेकर रामचरितमानस तक फैली सनातन परंपरा को सरल, प्रवाहपूर्ण और तर्कसंगत शैली में प्रस्तुत करते हुए मोरारी बापू ने कहा कि सनातन धर्म किसी कालखंड में जन्मा पंथ नहीं, बल्कि समय से परे बहती वह धारा है जो सभी आध्यात्मिक परंपराओं को जोड़ती है। उनके शब्दों में, “सत्य, प्रेम, करुणा और अहिंसा — यही सनातन धर्म की आत्मा हैं।”
कथा के दौरान मोरारी बापू ने जहां सनातन धर्म पर बाहरी आघातों की चर्चा की, वहीं सबसे गहरी चिंता आंतरिक विघटन को लेकर व्यक्त की। उन्होंने स्पष्ट कहा कि आज सबसे बड़ा संकट उन प्रवृत्तियों से है, जो अपने-अपने आराध्य या विचारधारा को श्रेष्ठ साबित करने के लिए शास्त्रों में अनधिकृत फेरबदल कर रही हैं। ऐसे प्रयास भले ही किसी ‘गादी’ का संरक्षण पा लें, पर व्यास गादी की स्वीकृति उन्हें कभी नहीं मिल सकती — क्योंकि व्यास परंपरा सदा भगवान राम, कृष्ण, शिव और देवी दुर्गा जैसे सनातन आराध्यों से जुड़ी रही है।
सनातन धर्म की शास्त्रीय मर्यादा को रेखांकित करते हुए मोरारी बापू ने कहा कि इसकी ग्रंथ परंपरा वेदों से प्रारंभ होकर उपनिषदों, पुराणों और श्रीमद्भगवद्गीता तक आती है तथा गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस पर आकर पूर्ण होती है। इसके बाद रचित किसी भी ग्रंथ को सनातन धर्म की मूल शास्त्रीय परंपरा में सम्मिलित नहीं किया जा सकता। यह बात उन्होंने दृढ़ता के साथ दोहराई, जिसे श्रोताओं ने तालियों के साथ स्वीकार किया।
कथा में आध्यात्मिक प्रतीकों का काव्यात्मक चित्रण विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। मोरारी बापू के शब्दों में सनातन धर्म की धारा गंगा है, उसका शिखर कैलास है, उसकी छाया अक्षय वट है, उसका ग्रंथ वेद हैं, उसका चक्र सुदर्शन है, उसकी शीतलता चंद्रमा है और उसका प्रकाश सूर्य देव हैं। इन प्रतीकों ने श्रोताओं को दर्शन और संवेदना की एक अलग ही यात्रा पर ले गया।
इस भव्य आयोजन को राष्ट्रीय गरिमा भी मिली। उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने कथा का उद्घाटन किया, जबकि उद्घाटन और समापन अवसर पर पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की उपस्थिति ने कार्यक्रम को विशेष महत्व दिया। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कथा के दौरान यमुना नदी की पूर्ण स्वच्छता का संकल्प लेकर आयोजन को सामाजिक सरोकार से भी जोड़ा।
कथा आरंभ होने से पहले मोरारी बापू का राजघाट जाकर महात्मा गांधी की समाधि पर नमन करना भी प्रतीकात्मक था — जैसे अहिंसा, सत्य और करुणा की सनातन परंपरा को राष्ट्रपिता की विरासत से जोड़ना।
इस राम कथा के सूत्रधार जैन संत आचार्य लोकेश मुनि रहे, जो वर्ल्ड पीस सेंटर के संस्थापक भी हैं। मोरारी बापू और उनके भक्तों के सहयोग से न केवल यह आयोजन संभव हुआ, बल्कि वर्ल्ड पीस सेंटर के लिए संसाधन जुटाने का भी एक सशक्त माध्यम बना। आठवें दिन विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति ने सनातन धर्म की समावेशी और उदार प्रकृति को और अधिक रेखांकित किया।
मानस सनातन धर्म मोरारी बापू की 971वीं राम कथा थी — और शायद सबसे महत्वपूर्ण भी, क्योंकि यह ऐसे समय में हुई जब सनातन परंपरा को नए सिरे से समझने और संभालने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। उल्लेखनीय है कि मोरारी बापू कभी किसी कथा के लिए पारिश्रमिक स्वीकार नहीं करते। कथा और प्रसाद — दोनों सभी के लिए निःशुल्क रहते हैं।
सत्य, प्रेम और करुणा के शाश्वत मूल्यों पर टिकी यह राम यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सनातन चेतना को जागृत रखने का सांस्कृतिक अभियान बनकर उभरी — ऐसा अभियान, जो भारत की आत्मा को उसके मूल से जोड़ने का प्रयास करता है।