'हरि शंकर तिबरेवाला मामले में न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान आवश्यक'

जांच, आरोपपत्र और न्यायालय द्वारा संज्ञान-इन तीनों चरणों के बीच स्पष्ट अंतर समझे बिना किसी भी आरोपी को दोषी की तरह प्रस्तुत करना न केवल विधिक रूप से अनुचित है, बल्कि निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार पर भी आंच डालता है
भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में जांच, आरोपपत्र (या शिकायत) दाखिल होना और न्यायालय द्वारा उसका संज्ञान लेना-तीनों अलग-अलग कानूनी चरण हैं।
न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान आवश्यक: हरि शंकर तिबरेवाला के मामले में निष्पक्षता और निर्दोषता के सिद्धांत की महत्ता
Published on

नई दिल्ली : हरि शंकर तिबरेवाला का नाम पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न जांचों से जुड़ी खबरों में बार-बार सामने आया है। लेकिन इस पूरे मामले में एक अहम कानूनी सिद्धांत पर ध्यान देना जरूरी है-क्या किसी व्यक्ति को तब तक दोषी माना जा सकता है, जब तक किसी सक्षम न्यायालय ने आरोपों पर विधिक रूप से विचार ही शुरू न किया हो?

भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में जांच, आरोपपत्र (या शिकायत) दाखिल होना और न्यायालय द्वारा उसका संज्ञान लेना-तीनों अलग-अलग कानूनी चरण हैं। जांच एजेंसी द्वारा आरोप लगाए जाने या रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने का अर्थ यह नहीं होता कि आरोप साबित हो गए हैं।

'संज्ञान' वह प्रक्रिया है, जिसमें न्यायालय यह तय करता है कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर मामला आगे सुनवाई के योग्य है या नहीं। इसके बाद ही न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ती है। किसी भी व्यक्ति का दोष या निर्दोष होना अंततः न्यायालय द्वारा साक्ष्यों और विधिक परीक्षण के आधार पर ही तय किया जाता है।

यदि किसी मामले में सक्षम न्यायालय ने अभी तक आरोपों का संज्ञान नहीं लिया है, तो यह कहना उचित नहीं होगा कि संबंधित व्यक्ति दोषी है। ऐसे मामलों में आरोपों की सत्यता पर अभी न्यायिक परीक्षण होना बाकी होता है।

निर्दोषता की धारणा बनाए रखना जरूरी

भारतीय कानून का एक बुनियादी सिद्धांत है कि जब तक किसी व्यक्ति का अपराध न्यायालय में सिद्ध नहीं हो जाता, तब तक उसे निर्दोष माना जाता है। इसे Presumption of Innocence यानी निर्दोषता की धारणा कहा जाता है। यह केवल कानूनी तकनीकी पहलू नहीं, बल्कि संविधान और विधि के शासन की मूल भावना का हिस्सा है।

आरोप और दोष सिद्ध होने के बीच का अंतर स्पष्ट बनाए रखना जरूरी

मीडिया लोकतंत्र का महत्वपूर्ण स्तंभ है और जनता तक जानकारी पहुंचाने की उसकी अहम भूमिका है। हालांकि, न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े मामलों में रिपोर्टिंग करते समय आरोप और दोष सिद्ध होने के बीच का अंतर स्पष्ट बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। यदि किसी व्यक्ति को केवल जांच या आरोपों के आधार पर दोषी की तरह प्रस्तुत किया जाता है, तो इससे उसकी प्रतिष्ठा और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

साक्ष्यों, गवाहों और विधिक प्रक्रिया के आधार पर फैसले का हक

हर नागरिक को यह अधिकार है कि उसके विरुद्ध लगाए गए आरोपों का फैसला अदालत में उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहों और विधिक प्रक्रिया के आधार पर हो। किसी व्यक्ति का अपराध या निर्दोषता मीडिया रिपोर्टों, अटकलों या एकतरफा आरोपों से नहीं, बल्कि न्यायालय के निर्णय से तय होती है।

यह सिद्धांत केवल किसी एक व्यक्ति के मामले तक सीमित नहीं है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्याय का आधार यही है कि अंतिम निर्णय अदालत दे, न कि सार्वजनिक धारणा। इसलिए न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करना और अंतिम निर्णय आने तक किसी भी व्यक्ति को दोषी मानने से बचना, विधि के शासन और निष्पक्ष न्याय व्यवस्था की मूल आवश्यकता है।

Google पर सन्मार्ग न्यूज़ पडे →
logo
Sanmarg Hindi daily
sanmarg.in