खेतों की आजादी, आत्मनिर्भर भारत की कहानी, हरित क्रांति से जलवायु-सक्षम कृषि तक

आज भारत को दूसरी हरित क्रांति से अधिक एक नई कृषि क्रांति की आवश्यकता है जो जलवायु-सक्षम, संसाधन-कुशल, तकनीक-आधारित और किसान-केंद्रित हो...
तकनीक व किसान मिलकर रचेंगे हरित क्रांति का कीर्तिमान
तकनीक आधारित होगी दूसरी हरित क्रांति
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जिस देश ने औपनिवेशिक दौर में खाद्यान्न की कमी, अकाल और बाहरी निर्भरता का दर्द देखा था, उसने स्वतंत्रता के बाद विज्ञान, नीति और किसान के अथक परिश्रम के बल पर कृषि आत्मनिर्भरता की एक असाधारण यात्रा पूरी की। यह यात्रा केवल उत्पादन बढ़ाने की कहानी नहीं है; यह भारत के वैज्ञानिक आत्मविश्वास, संस्थागत क्षमता और किसान की शक्ति के उभार की कहानी भी है।

इस यात्रा में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की भूमिका किसी मूक सहयात्री की नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के एक प्रमुख वैज्ञानिक संस्थान की रही है। 16 जुलाई, 1929 को स्थापित ICAR आज कृषि, बागवानी, पशुपालन और मत्स्य विज्ञान सहित कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा के देशव्यापी तंत्र का शीर्ष निकाय है। ICAR के अनुसंधान और प्रौद्योगिकी विकास ने हरित क्रांति से लेकर कृषि के बाद के विकास तक देश की खाद्य और पोषण सुरक्षा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

खाद्यान्न उत्पादन की दीर्घकालीन यात्रा विशेष रूप से उल्लेखनीय है। 1950-51 में भारत का खाद्यान्न उत्पादन लगभग 50.8 मिलियन टन था। इसके बाद हरित क्रांति, सिंचाई के विस्तार, उन्नत बीज, उर्वरक, कृषि यंत्रीकरण और वैज्ञानिक प्रबंधन ने उत्पादन को लगातार नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। हाल के वर्षों में यह उत्पादन 376 मिलियन टन से ऊपर पहुंच चुका है। इस परिवर्तन को केवल कुल उत्पादन से नहीं, बल्कि उत्पादन की गति से भी समझना चाहिए। दुग्ध क्षेत्र में भी परिवर्तन की गति उल्लेखनीय रही। वर्ष 2000 से 2014 के बीच दूध उत्पादन में औसतन लगभग 4.2 मिलियन टन प्रतिवर्ष की वृद्धि हुई, जो 2014 से 2025 के बीच बढ़कर करीब 10.2 मिलियन टन प्रतिवर्ष हो गई। यह बताता है कि कृषि आत्मनिर्भरता की कहानी खेत की फसल से आगे बढ़कर पशुधन, डेयरी और संबद्ध क्षेत्रों तक पहुंच चुकी है।

आजादी के शुरुआती वर्षों में भारत के सामने सबसे बड़ा प्रश्न था - अपने नागरिकों को पर्याप्त भोजन कैसे मिले? उस समय खाद्यान्न की उपलब्धता राष्ट्रीय चिंता थी।

कृषि अनुसंधान को खेत की जरूरतों से जोड़ना, अधिक उपज देने वाली किस्में विकसित करना, बीज की गुणवत्ता सुधारना और उत्पादन की वैज्ञानिक तकनीकों को किसानों तक पहुंचाना राष्ट्रीय प्राथमिकता बन गया। हरित क्रांति इसी वैज्ञानिक यात्रा का निर्णायक अध्याय बनी। उच्च उत्पादकता वाली किस्मों, सिंचाई, उर्वरकों, कृषि यंत्रीकरण और वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों के समन्वय ने भारतीय कृषि का चेहरा बदल दिया ।

लेकिन हरित क्रांति की सफलता के साथ नई चुनौतियां भी सामने आईं। भूजल पर दबाव, मिट्टी की सेहत, जैव विविधता में कमी, रासायनिक इनपुट पर निर्भरता और क्षेत्रीय असंतुलन ने हमें यह सोचने के लिए मजबूर किया कि कृषि का अगला चरण केवल “अधिक उत्पादन” का नहीं हो सकता। आज भारत को दूसरी हरित क्रांति से अधिक एक नई कृषि क्रांति की आवश्यकता है जो जलवायु-सक्षम, संसाधन-कुशल, तकनीक-आधारित और किसान-केंद्रित हो। जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की आशंका नहीं, वर्तमान की वास्तविकता है। अत्यधिक गर्मी, असमय वर्षा, सूखा, बाढ़ और चक्रवात सीधे फसल और किसान की आय को प्रभावित कर रहे हैं।

ऐसे समय में ICAR का जलवायु-अनुकूल कृषि पर राष्ट्रीय नवाचार (NICRA)जैसे कार्यक्रम महत्वपूर्ण हो जाते हैं। वैज्ञानिक अनुसंधान का लक्ष्य अब केवल अधिक उपज देने वाली फसल तैयार करना नहीं है; लक्ष्य ऐसी किस्मों और कृषि प्रणालियों का विकास है जो बदलती जलवायु में भी किसान को उत्पादन और आय की सुरक्षा दे सकें । सूखा और गर्मी सहन करने वाली किस्में, कम पानी में उत्पादन, संरक्षण कृषि, फसल विविधीकरण, सूक्ष्म सिंचाई, एकीकृत कृषि प्रणाली, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, कृषि वानिकी और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण फसल बीमा योजना इसी दिशा के महत्वपूर्ण कदम हैं।

आज की कृषि क्रांति की एक और पहचान है - डेटा और डिजिटल तकनीक। किसान के हाथ में स्मार्टफोन है। खेत के ऊपर ड्रोन है। उपग्रह से फसल और मिट्टी की निगरानी संभव है।

मौसम की जानकारी पहले की तुलना में कहीं अधिक स्थानीय स्तर तक पहुंच सकती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रिमोट सेंसिंग, सेंसर, रोबोटिक्स और डिजिटल सलाहकारी प्रणालियां खेती में निर्णय लेने की प्रक्रिया को बदल सकती हैं।लेकिन तकनीक की असली सफलता उसके अत्याधुनिक होने में नहीं, बल्कि किसान के लिए उपयोगी होने में है।

भारत की कृषि आत्मनिर्भरता का अगला लक्ष्य केवल खाद्यान्न में आत्मनिर्भर रहना नहीं है। दलहन और तिलहन में आत्मनिर्भरता, पोषण सुरक्षा, बागवानी, पशुधन, मत्स्य, खाद्य प्रसंस्करण और उच्च-मूल्य कृषि को भी समान महत्व देना होगा। विशेष रूप से दलहन और तिलहन में आत्मनिर्भरता रणनीतिक महत्व रखती है।

भारत की कृषि विविधता उसकी शक्ति भी है और चुनौती भी। पूर्वोत्तर की खेती, राजस्थान की शुष्क कृषि, पंजाब-हरियाणा की सिंचित खेती, तटीय क्षेत्रों की कृषि और पहाड़ी क्षेत्रों की खेती की समस्याएं अलग हैं। इसलिए भविष्य का कृषि अनुसंधान ‘एक देश, एक तकनीक’ की सोच से आगे बढ़कर ‘हर क्षेत्र के लिए उपयुक्त विज्ञान’ पर आधारित होना चाहिए। छोटे और सीमांत किसानों के लिए छोटी और सस्ती मशीनें, स्थानीय जलवायु के अनुरूप बीज, क्षेत्र-विशेष की डिजिटल सलाह और स्थानीय बाजार से जुड़ी कृषि प्रणालियां आने वाले समय में निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। साथ ही ICAR सीमांत किसानों की जरूरत के अनुरूप छोटी कृषि मशीनों को प्राथमिकता देने की आवश्यकता पर भी जोर दे रहा है।

- डॉ. एम. एल. जाट,
महानिदेशक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) एवं सचिव, डेयरी
- डॉ. एम. एल. जाट, महानिदेशक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) एवं सचिव, डेयरी
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