

महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर सियासी हलचल तेज हो गई है। शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने रविवार को मुंबई स्थित मातोश्री में पार्टी सांसदों की अहम बैठक बुलाई। ऐसे समय में यह बैठक हुई है जब पार्टी के कुछ सांसदों के एकनाथ शिंदे गुट और भाजपा के संपर्क में होने की चर्चाएं लगातार जोर पकड़ रही हैं।
बैठक को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की रही कि पार्टी के सभी सांसद इसमें मौजूद नहीं थे। नौ सांसदों वाली शिवसेना (यूबीटी) में से तीन सांसद बैठक से दूर रहे, जिससे राजनीतिक गलियारों में अटकलों का दौर और तेज हो गया। हालांकि पार्टी ने अनुपस्थिति के अलग-अलग कारण बताए हैं, लेकिन विपक्ष और राजनीतिक विश्लेषक इसे संभावित असंतोष से जोड़कर देख रहे हैं।
मातोश्री में आयोजित बैठक में मुंबई दक्षिण के सांसद अरविंद सावंत, मुंबई दक्षिण मध्य के सांसद अनिल देसाई, नासिक के सांसद राजाभाऊ वाजे और मुंबई उत्तर-पूर्व के सांसद संजय दीना पाटिल मौजूद रहे। वहीं यवतमाल-वाशिम के संजय देशमुख और हिंगोली के नागेश पाटिल आष्टीकर ऑनलाइन माध्यम से जुड़े।
दूसरी ओर परभणी के सांसद संजय जाधव, शिर्डी के सांसद भाऊसाहेब वाकचौरे और धाराशिव के सांसद ओमराजे निंबालकर बैठक में शामिल नहीं हुए। निंबालकर की अनुपस्थिति को लेकर पार्टी ने पारिवारिक कारण बताया है, जबकि अन्य सांसदों की गैरमौजूदगी को लेकर राजनीतिक चर्चाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं।
दरअसल, हाल के दिनों में महाराष्ट्र में 'ऑपरेशन टाइगर' की चर्चा जोरों पर है। दावा किया जा रहा है कि भाजपा और शिंदे गुट उद्धव ठाकरे की पार्टी में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में उद्धव ठाकरे की यह बैठक केवल संगठनात्मक समीक्षा भर नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे सांसदों की नब्ज टटोलने और पार्टी में एकजुटता का संदेश देने की कवायद के रूप में देखा जा रहा है।
इस बीच शिवसेना (यूबीटी) के प्रवक्ता आनंद दुबे ने संभावित दल-बदल की खबरों को खारिज करते हुए भाजपा पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि 2024 से लगातार अफवाहें फैलाई जा रही हैं कि पार्टी के सांसद भाजपा या शिंदे गुट में शामिल होने वाले हैं। दुबे ने सवाल उठाया कि जब भाजपा के पास पूर्ण बहुमत की सरकार है तो उसे दूसरी पार्टियों में तोड़फोड़ करने की जरूरत क्यों पड़ रही है।
उन्होंने कहा, "विकास के मुद्दों पर काम करने के बजाय विपक्षी दलों को तोड़ना लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। हम भाजपा नेताओं के लिए भी प्रार्थना करेंगे कि उन्हें सद्बुद्धि मिले।"
अब सबकी नजर इस बात पर है कि मातोश्री की इस बैठक के बाद उद्धव ठाकरे अपने सांसदों को कितना एकजुट रख पाते हैं। क्योंकि महाराष्ट्र की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों ने यह साबित कर दिया है कि सियासी बगावत कभी भी और कहीं से भी शुरू हो सकती है।