कामकाजी महिलाओं को मासिक धर्म के दिनों में छुट्टी नीति पर मतभेद

मासिक धर्म छुट्टी नीति महिलाओं के नौकरी के अवसर कम कर सकती है – सुप्रीम कोर्ट
कामकाजी महिलाओं को मासिक धर्म के दिनों में छुट्टी नीति पर मतभेद
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सर्जना शर्मा

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों मासिक धर्म के दिनों में वेतन सहित छुट्टी दिए जाने की याचिका को खारिज करते हुए कहा ये महिलाओं के हित में नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता वकील को कहा कि राष्ट्रव्यापी मासिक धर्म अवकाश नीति बनी तो महिलाओं को कोई नौकरी नहीं देगा उनके कामकाज के अवसर कम हो जायेंगे।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत शर्मा की अध्यक्षता में गठित तीन सदस्यीय बैंच ने कहा इससे लिंग भेद बढ़ेगा उनके कामकाज के अवसर कम होगें इसके लिए महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को कोई नीति बनानी चाहिए। ये जटिल मामला है इसमें भले ही कामगार का कल्याण है लेकिन इसके आर्थिक परिणाम अच्छे नहीं होंगे। इस बारे में संस्थान स्वयं ही कुछ लचीली नीति बना सकते हैं देश व्यापी नीति नहीं बनायी जा सकती। इसके दीर्घकालिक प्रभाव को समझना जरूरी है। याचिका कर्ता एस एम त्रिपाठी ने दो दिन के अवकाश की मांग की थी। अदालत ने त्रिपाठी को कहा कि वे इस मामले को अब और आगे न बढ़ाएं।

ये सच है कि महिलाओं को हर महीने एक निश्चित आयु तक मासिक धर्म की तकलीफ सहनी पड़ती है। परंपरागत भारतीय सनातन समाज में महिलाओं को चार दिन तक चूल्हे चौके और कोई भी भारी काम करने की मनाही होती थी। उसका कारण धर्म नहीं बल्कि उनकी शारीरिक तकलीफों के कारण आराम का अवसर दिया जाता था। लेकिन प्रगतिशील महिलाओं ने इसे रूढ़िवादी परंपरा बताया और कहा कि हिंदू समाज महिलाओं के साथ भेदभाव और छुआछूत करता है।

हैरानी तो तब होती है जब यही वामपंथी प्रगतिशील महिलाएं कामकाजी महिलाओं को चार दिन की छुट्टी देने की पैरवी करने लगीं। इस मामले के कई पहलू हैं एक और कार्यक्षेत्र में समानता की बात की जाती है तो फिर ये छुट्टी क्यों। छुट्टी दिए जाने की हिमायती महिलाएं कहती हैं कि महिला और पुरुष की प्रकृति और शरीर की बनावट अलग अलग है। मासिक धर्म कोई बीमारी नहीं है बल्कि प्रकृति ने उनके शरीर की संरचना ही ऐसी की है। संतान धारण करने की क्षमता उनको ही मिली है पुरुषों को नहीं। इसलिए इस बारे में देश के कारपोरेट जगत और अन्य क्षेत्रों में मासिक धर्म छुट्टी दिए जाने की नीति बननी चाहिए।

सभी कामकाजी महिलाएं मासिक धर्म अवकाश के पक्ष में हों ऐसा भी नहीं है सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता मधुरिमा तातिया कहती हैं कि ये महिलाओं को सशक्त नहीं करेगा । कार्यस्थल में महिला कर्मियों को अलग थलग कर देगा और जहां वे काम करती हैं वहां उनके लिए मुश्किलें पैदा करेगा। मालिकान महिलाओं को नौकरी देने से परहेज करेंगे। कुछ पेशे ऐसे हैं जिनमें छुट्टी देना मुश्किल होगा सेना, पुलिस, पत्रकारिता ,हवाई सेवाएं, होटल उद्योग आदि ।वरिष्ठ पत्रकार विचित्रा शर्मा कहती हैं कि छुट्टी देने के बजाए कुछ सुविधाएं संस्थान दे सकते हैं जैसे कि मेडिकल रेस्ट रूम , कामकाज के फ्लेक्सीबल घंटे या फिर दो दिन की छुट्टी की महिला कर्मी स्वयं बाद में पूर्ति कर दे। इस मामले में महिलाओं की राय अलग अलग है सब इस पर सहमत नहीं हैं ।

ऐसी याचिका पहली बार सुप्रीम कोर्ट में नहीं यी इससे पहले फरवरी 2023 में भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इस मामले की पूरी स्टडी करके और इसके परिणामों को ध्यान में रख कर सरकार कोई नीति बनाए। कर्नाटक और बिहार में मासिक धर्म अवकाश नीति लागू है लेकिन जमीनी सच्चाई ये है कि सरकारी स्तर पर भले ही वेतन मिल जाता हो लेकिन निजी संस्थानों में तो छुट्टी का वेतन कटता है।

विदेशों में स्पेन ने तीन से पांच दिन की छुट्टी की नीति लागू की है और सरकार न दिनों की छुट्टी का वेतन देती है।रूस, जापान, जांबिया और दक्षिण कोरिया में भी वेतन सहित अवकाश दिया जाता है। जैसा कि अक्सर होता है हर कानून का दुरुपयोग भी होता है ऐसा ही इस मामले में भी है अनेक महिलाओं द्वारा सरकारी नीति को गलत लाभ उठाने की खबरें भी आती रहती हैं।

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