

प्रसेनजीत, सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : केंद्र सरकार द्वारा लोकसभा में पेश किए गए संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026, डिलिमिटेशन विधेयक, 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 ने देश की चुनावी संरचना में बड़े बदलाव की दिशा तय कर दी है। हालांकि शुक्रवार को लोकसभा में वोटिंग के बाद बिल पारित नहीं हो पाया लेकिन प्रस्तावित प्रावधानों के अनुसार, पश्चिम बंगाल की लोकसभा सीटों की संख्या 42 से बढ़ाकर 61 करने का सुझाव था, यानी राज्य को 19 नयी संसदीय सीटें मिल सकती थीं। यह प्रस्ताव 2011 की जनगणना के आधार पर तैयार किया गया है, जिससे जनसंख्या अनुपात के अनुसार प्रतिनिधित्व को फिर से संतुलित करने की कोशिश की जा रही है।
बदलेगा राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व संतुलन
गौरतलब है कि 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत की कुल आबादी 1,21,08,54,977 थी, जबकि पश्चिम बंगाल की जनसंख्या 9,12,76,115 दर्ज की गई, जो राष्ट्रीय आबादी का लगभग 7.5% हिस्सा है। मौजूदा व्यवस्था में बंगाल के पास 42 लोकसभा सीटें हैं। यदि कुल सीटें यथावत रखते हुए सीटों का परिसीमन किया जाए तो यह संख्या घटकर लगभग 41 हो सकती है, लेकिन प्रस्तावित 50% वृद्धि मॉडल के तहत यह बढ़कर 61 तक पहुंचने का अनुमान है, जिससे राज्य की संख्यात्मक राजनीतिक ताकत में उल्लेखनीय इजाफा होगा।
परिसीमन की समय-सीमा पर स्पष्ट प्रावधान नहीं
हालांकि PRS द्वारा जारी विश्लेषण में कई महत्वपूर्ण सवाल उठाये गये हैं। संविधान संशोधन विधेयक में परिसीमन की समय-सीमा और उसकी नियमितता को लेकर कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं दिया गया है। इसमें यह अधिकार संसद को सौंपा गया है कि वह साधारण बहुमत से तय करे कि परिसीमन कब होगा और किस जनगणना के आंकड़ों को आधार बनाया जाएगा, जिससे भविष्य में राजनीतिक हस्तक्षेप की आशंका जताई जा रही है। डिलिमिटेशन विधेयक, 2026 के तहत अगला परिसीमन 2011 की जनगणना के आधार पर किए जाने की अनुमति दी गई है, जिससे राज्यों के बीच सीटों के बंटवारे में बड़ा बदलाव संभव माना जा रहा है। वहीं ‘डिलिमिटेशन आयोग’ शब्द को शामिल तो किया गया है, लेकिन इसकी स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है, जिससे इसकी संरचना और अधिकारों को लेकर अस्पष्टता बनी हुई है।