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सुप्रीम कोर्ट

'धार्मिक वजह से ‘वंदे मातरम्’ न गाना अपराध नहीं '

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, इस मामले में केंद्र सरकार से मांगा जवाब
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राष्ट्रगीत केवल दो अंतरों तक सीमित रहेगा या छह अंतरों तक सीमित करने से इनकार

नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने ‘वंदे मातरम’ से जुड़े मामले में मंगलवार को कहा कि धार्मिक कारणों से राष्ट्रगीत न गाने वाले व्यक्ति को आपराधिक कार्रवाई का सामना नहीं करना चाहिए। कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अगवाई वाले पीठ ने इस पर विचार करने पर सहमति जतायी कि ‘वंदे मातरम्’ न गाने को दंडनीय अपराध बनाया जा सकता है या नहीं। पीठ ने यह तय करने से इनकार किया कि राष्ट्रगीत केवल दो अंतरों तक सीमित रहेगा या छह अंतरों तक होगा। कानून में ‘वंदे मातरम्’ के गायन को रोकने या गायन में जानबूझकर बाधा डालने को दंडनीय बनाया गया है। यह सुनवाई गायक टीएम कृष्णा की याचिका पर हुई। याची कृष्णा ने तर्क दिया कि अंतिम चार पैरा हिंदू देवताओं के प्रति भक्ति का आह्वान करते हैं। इन पैराग्राफ को गाना अनिवार्य बनाना देश के धर्मनिरपेक्षता का उल्लंघन है। ‘वंदे मातरम्’ को कानून के दायरे में लाने वाला संशोधन बिल 29 जुलाई को राज्यसभा और 30 जुलाई को लोकसभा से पास हुआ था। इसके बाद 6 अगस्त को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने पर यह कानून बन गया।

बिजो इमैनुअल मामला : 3 छात्रों ने राष्ट्रगान गाने से मना कर दिया

कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि वंदे मातरम से जुड़े कानून की व्याख्या करते समय 1986 के ‘बिजो इमैनुअल’ फैसले में तय सिद्धांतों को लागू किया जायेगा। गौरतलब है कि 1986 के बिजो इमैनुअल बनाम केरल सरकार मामले में तीन छात्रों ने धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगान नहीं गाया था। हालांकि वे राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहते थे। सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ कार्रवाई को रद्द करते हुए कहा था कि केवल राष्ट्रगान न गाने के आधार पर उन्हें दंडित नहीं किया जा सकता।

‘नक्सली’ शब्द पर मेहता और मुरलीधर में बहस

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और कृष्णा कीपैरवी कर रहे सीनियर एडवोकेट डॉ एस मुरलीधर के बीच तीखी बहस भी हुई। संविधान के तहत निर्णय लेने की प्रक्रिया पर मुरलीधर की दलील के जवाब में मेहता ने ‘नक्सली’ शब्द का इस्तेमाल किया। मुरलीधर ने इस पर कड़ा विरोध जताते हुए इसे वापस लेने को कहा। इसके बाद पीठ ने हस्तक्षेप किया। पीठ ने सांविधानिक संस्थाओं की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति पर आतंकी होने का आरोप हो, तब भी संविधान के तहत उसके अधिकार बने रहते हैं।

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