

दुनिया भर के मौसम वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ाने वाली खबर सामने आई है। विश्व मौसम संगठन (WMO) ने अनुमान जताया है कि जून से अगस्त 2026 के बीच अल नीनो विकसित होने की संभावना लगभग 80 प्रतिशत तक पहुंच गई है। इससे पहले अमेरिकी जलवायु पूर्वानुमान एजेंसियों ने इसकी संभावना कम बताई थी, लेकिन हालिया आंकड़ों ने जोखिम को और बढ़ा दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशांत महासागर में तेजी से बदल रही समुद्री परिस्थितियां अल नीनो के बनने के संकेत दे रही हैं। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय मौसम एजेंसियां लगातार अपने पूर्वानुमानों को अपडेट कर रही हैं।
अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जिसमें मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर के सतही जल का तापमान सामान्य से अधिक बढ़ जाता है। यह स्थिति वैश्विक मौसम चक्र को प्रभावित करती है और कई देशों में बारिश, तापमान तथा सूखे के पैटर्न में बड़े बदलाव ला सकती है।
आमतौर पर यह घटना कई महीनों तक बनी रहती है और इसका असर दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग रूप में दिखाई देता है।
भारत में अल नीनो का सीधा संबंध दक्षिण-पश्चिम मॉनसून से माना जाता है। आमतौर पर अल नीनो की स्थिति बनने पर मानसूनी बारिश कमजोर पड़ सकती है, जिससे कई राज्यों में सामान्य से कम वर्षा होने का खतरा बढ़ जाता है।
कमजोर मॉनसून का असर कृषि उत्पादन, जल भंडारण और तापमान पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अल नीनो प्रभावी रहता है तो देश के कई हिस्सों में गर्मी का दौर लंबा खिंच सकता है और वर्षा की मात्रा प्रभावित हो सकती है।
WMO के मुताबिक, अल नीनो के विकसित होने के बाद इसके साल के अंत तक बने रहने की संभावना भी काफी अधिक है। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि यह स्थिति वैश्विक स्तर पर सूखा, कृषि संकट और चरम मौसम की घटनाओं को बढ़ावा दे सकती है।
दूसरी ओर, कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा और बाढ़ जैसी परिस्थितियां भी पैदा हो सकती हैं। इसलिए आने वाले महीनों में दुनिया भर की मौसम एजेंसियां इस प्रणाली की गतिविधियों पर लगातार नजर बनाए रखेंगी।
जलवायु विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ते वैश्विक तापमान के बीच अल नीनो जैसी घटनाओं का प्रभाव पहले की तुलना में अधिक गंभीर हो सकता है, जिससे मौसम संबंधी चुनौतियां और बढ़ सकती हैं।