भारत में ‘सॉफ्ट टेरर’ की नई साजिश : प्रोपेगेंडा से युवाओं को प्रभावित करने की कोशिश का खुलासा

ISI की कथित ‘सॉफ्ट टेरर’ साजिश में सीमावर्ती राज्यों के युवाओं को प्रोपेगेंडा, ग्राफिटी और नकली संगठन TTH के नाम से भारत विरोधी नैरेटिव फैलाने के लिए इस्तेमाल करने का आरोप
सीमावर्ती इलाकों के कॉलेज छात्रों और कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि वाले युवाओं को टारगेट करने की संभावना
ISI द्वारा भारत के खिलाफ “सॉफ्ट टेरर” और प्रोपेगेंडा आधारित रणनीति अपनाने की कोशिश का दावा
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Inter-Services Intelligence (ISI) द्वारा भारत के खिलाफ “सॉफ्ट टेरर” और प्रोपेगेंडा आधारित रणनीति अपनाने की कोशिश का दावा सामने आया है। खुफिया रिपोर्ट्स के हवाले से कहा जा रहा है कि यह गतिविधियां सीमावर्ती राज्यों में युवाओं को निशाना बनाकर की जा रही हैं, जिनका उद्देश्य समाज में भ्रम और असंतोष फैलाना है।

रिपोर्ट में आरोप है कि इस रणनीति के तहत कुछ संवेदनशील इलाकों में युवाओं, खासकर नशे की लत से जूझ रहे लोगों को पैसों का लालच देकर दीवारों पर भारत विरोधी ग्राफिटी और नारे लिखवाने का काम कराया जा रहा है। इन गतिविधियों का उद्देश्य किसी बड़े हमले से अधिक “नैरेटिव वॉर” यानी विचारों और मानसिकता को प्रभावित करना बताया गया है।

फर्जी संगठन के नाम “TTH” का भी इस्तेमाल

सूत्रों के अनुसार, इस कथित अभियान में एक फर्जी संगठन का नाम “तहरीक-ए-तालिबान हिंदुस्तान” (TTH) भी इस्तेमाल किए जाने की बात कही जा रही है, जिसे भारत में मौजूद बताकर भ्रम पैदा करने की कोशिश की जा रही है। दावा किया गया है कि इसका मकसद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को गलत तरीके से पेश करना और संवेदनशील मुद्दों को हवा देना है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस तरह की गतिविधियों में सीमावर्ती इलाकों के कॉलेज छात्रों और कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि वाले युवाओं को टारगेट किया जा सकता है। उन्हें छोटे-छोटे भुगतान के बदले रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों, कॉलेजों और सार्वजनिक दीवारों पर संदेश लिखने के लिए कहा जाता है।

सुरक्षा एजेंसियां सतर्क

हालांकि, सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि वे इस तरह की किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर लगातार नजर बनाए हुए हैं और संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी को और मजबूत किया गया है। अधिकारियों के अनुसार, किसी भी तरह की भड़काऊ या अवैध गतिविधि को रोकने के लिए जमीनी स्तर पर सतर्कता बढ़ा दी गई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक दौर में संघर्ष केवल हथियारों तक सीमित नहीं है, बल्कि सूचना, सोशल मीडिया और मानसिक प्रभाव के जरिए भी “नरम युद्ध” (soft warfare) की रणनीतियां अपनाई जा रही हैं, जिनसे निपटने के लिए समाज और प्रशासन दोनों की सतर्कता जरूरी है।

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