

सन्मार्ग संवाददाता
श्री विजय पुरम --
जवाहरलाल नेहरू राजकीय महाविद्यालय (जेएनआरएम) के वनस्पति विज्ञान स्नातकोत्तर विभाग के सहायक प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष डॉ. दीपोन शर्मा को प्रकृति संरक्षण के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण पहचान मिली है। उन्हें वर्ष 2026 से 2029 तक की अवधि के लिए प्रकृति संरक्षण के अंतरराष्ट्रीय संघ (आईयूसीएन) के प्रजाति अस्तित्व आयोग में सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया है। इस नियुक्ति के अंतर्गत वह मशरूम (कवक) और पफबॉल विशेषज्ञ समूह के सदस्य के रूप में अपनी सेवाएं देंगे। उनकी इस उपलब्धि को अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह के लिए गौरवपूर्ण क्षण माना जा रहा है।
स्विट्जरलैंड में मुख्यालय वाला प्रकृति संरक्षण का अंतरराष्ट्रीय संघ विश्व स्तर पर संकटग्रस्त प्रजातियों की लाल सूची के संकलन और रखरखाव के लिए जाना जाता है। इसका प्रजाति अस्तित्व आयोग संरक्षण विशेषज्ञों का एक प्रतिष्ठित वैश्विक नेटवर्क है, जिसमें 186 देशों के विशेषज्ञ शामिल हैं। यह आयोग विभिन्न प्रजातियों के संरक्षण, जैव विविधता के अध्ययन तथा प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा से संबंधित कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस प्रतिष्ठित विशेषज्ञ समूह में डॉ. शर्मा की नियुक्ति से अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह के शैक्षणिक और वैज्ञानिक क्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है।
डॉ. दीपोन शर्मा विशेष रूप से माइकोराइजल कवक के अध्ययन में विशेषज्ञता रखते हैं। उन्होंने वर्ष 2015 में अमेरिका के नॉर्दर्न एरिजोना विश्वविद्यालय में आयोजित माइकोराइजा पर आठवें अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में अपना शोध प्रस्तुत किया था। वह वर्ष 2011 से जेएनआरएम में प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित शोध पत्रिकाओं में उनके शोधपत्र प्रकाशित हो चुके हैं। उनके शोधपत्रों का प्रकाशन साइंस एडवांसेज, ग्लोबल चेंज बायोलॉजी और साइंटिफिक डेटा जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में हुआ है। इसके अतिरिक्त, वह प्रकृति और पर्यावरण से संबंधित विषयों पर नियमित रूप से लेखन भी करते हैं।
डॉ. शर्मा की इस अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि पर जेएनआरएम की प्राचार्य डॉ. पर्ल देवदास ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए उन्हें बधाई दी। महाविद्यालय के सभी प्राध्यापकों और कर्मचारियों ने भी उनकी नियुक्ति पर शुभकामनाएं दीं। महाविद्यालय परिवार ने इसे संस्थान के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए आशा व्यक्त की कि उनके शोध और विशेषज्ञता से प्रकृति संरक्षण तथा कवकों के अध्ययन के क्षेत्र में आगे भी महत्वपूर्ण योगदान मिलेगा।