अमेरिका में 6 आईटी कंपनियां ग्रीन कार्ड प्रोग्राम से बाहर

फैसले से भारतीय कंपनियों से जुड़े हजारों भारतीय पेशेवर प्रभावित हो सकते हैं
6 IT companies in the US out of the Green Card program
अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस
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वाशिंगटन : अमेरिका ने कथित धोखाधड़ी के आरोप में माइक्रोसॉफ्ट को स्थायी श्रम प्रमाणन (PERM) कार्यक्रम से निलंबित कर दिया है। ट्रंप प्रशासन ने कॉग्निजेंट, इंफोसिस, टाटा, विप्रो, कैपजेमिनी और एचसीएल को भी इस कार्यक्रम से निलंबित किया है। PERM कार्यक्रम के तहत कंपनियां एच-1बी वीजा पर काम कर रहे विदेशी कर्मचारियों के लिए ग्रीन कार्ड आवेदन कर सकती हैं। अमेरिकी श्रम मंत्री कीथ सोंडरलिंग ने उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की मौजूदगी में यह घोषणा की। उन्होंने कहा कि इन कंपनियों से जुड़े नए आवेदनों पर कार्रवाई नहीं की जाएगी और लंबित आवेदन भी आगे नहीं बढ़ाए जाएंगे। सोंडरलिंग के अनुसार, 2009 से इन कंपनियों ने करीब 30 लाख विदेशी कर्मचारियों के लिए आवेदन किए हैं। उन्हें 2.30 लाख से अधिक एच-1बी वीजा मंजूर हुए और एक लाख से ज्यादा स्थायी श्रम प्रमाणन जारी किए गए।

भारतीय पेशेवरों पर असर

इस फैसले से अमेरिका में कॉग्निजेंट, इंफोसिस, टाटा, विप्रो, एचसीएल और कैपजेमिनी जैसी भारतीय कंपनियों से जुड़े हजारों भारतीय पेशेवर प्रभावित हो सकते हैं। लंबे समय से ग्रीन कार्ड का इंतजार कर रहे कर्मचारियों की स्थायी निवास की प्रक्रिया रुक सकती है। इससे उन्हें मौजूदा नियोक्ता पर निर्भर रहना पड़ सकता है और वीजा नवीनीकरण की चुनौतियां बढ़ सकती हैं। वेंस ने माइक्रोसॉफ्ट पर अमेरिकी कर्मचारियों की जगह विदेशी कर्मचारियों को रखने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि कंपनी ने जिन अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से हटाया, उनकी जगह विदेशी कर्मचारियों की नियुक्ति की गई।

एच-1बी कार्यक्रम पर पहले से निशाना

एच-1बी कार्यक्रम लंबे समय से ट्रंप समर्थकों के निशाने पर है। उनका आरोप है कि इसका इस्तेमाल अमेरिकी कर्मचारियों की जगह विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने के लिए किया जाता है और इसमें दुरुपयोग की गुंजाइश है। यह कार्रवाई ऐसे समय हुई है, जब अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए ओपीटी (Optional Practical Training) को लेकर भी नए शुल्क का प्रस्ताव दिया है। प्रस्ताव के तहत पहली बार ओपीटी लेने वाले छात्र के लिए शैक्षणिक संस्थान को 70 हजार डॉलर और हर नवीनीकरण पर 30 हजार डॉलर शुल्क देना पड़ सकता है। इससे अमेरिका में उच्च शिक्षा हासिल करने वाले भारतीय छात्रों पर भी असर पड़ने की आशंका है।

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