

हावड़ा : पूर्व रेलवे के लिलुआ कैरिज एंड वैगन वर्कशॉप में ट्रेनों के बायो-टॉयलेट के अपशिष्ट संग्रह टैंक की मरम्मत और पुन: इस्तेमाल के लिए विशेष पर्यावरण अनुकूल तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस तकनीक के जरिए टैंकों की सफाई, मरम्मत और रिसाव की जांच का काम व्यवस्थित तरीके से किया जा रहा है।
बंद कक्ष में होती है टैंक की सफाई
ट्रेन के नीचे लगे अपशिष्ट संग्रह टैंक लंबे समय तक इस्तेमाल के बाद खराब हो जाते हैं। इन्हें ट्रेन से निकालकर वर्कशॉप में लाया जाता है। विशेष पावर नट रनर की मदद से टैंक के बोल्ट खोले जाते हैं और उसकी स्थिति की जांच की जाती है। इसके बाद 360 डिग्री घूमने वाले स्वचालित जेट की मदद से टैंक की सफाई की जाती है। यह पूरी प्रक्रिया बंद कक्ष में होती है, जिससे अपशिष्ट जल बाहर फैलने से रोका जा सके।
एसटीपी में कई चरणों में होता है जल उपचार
लिलुआ वर्कशॉप में प्रतिदिन करीब 40 हजार लीटर तक अपशिष्ट जल को साफ करने की क्षमता वाला सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) भी है। विभिन्न फिल्टर की मदद से पानी से हानिकारक तत्व और सूक्ष्म कण अलग किये जाते हैं। इसके बाद पानी में ऑक्सीजन मिलाकर कई चरणों में उसका उपचार और कीटाणुशोधन किया जाता है।
रिसाव रोकने के लिए विशेष गैसकेट
सफाई के बाद जरूरत के अनुसार टैंकों की वेल्डिंग की जाती है। रिसाव रोकने के लिए टैंक के अंदर नियोप्रीन रबर गैसकेट लगाया जाता है। इसके बाद पॉलीविनाइल मैट्रिक्स का इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रक्रिया में ऐसे बैक्टीरिया का उपयोग होता है, जो ऑक्सीजन के बिना भी जीवित रह सकते हैं। इससे अपशिष्ट के उपचार में मदद मिलती है।
वर्कशॉप में यह पूरी व्यवस्था चीफ वर्क्स मैनेजर यतीश कुमार की देखरेख में विकसित की गयी है। तकनीक के सफल इस्तेमाल के बाद रेलवे के अन्य जोन की वर्कशॉप में भी इसे अपनाने पर विचार किया जा रहा है। पूर्व रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी शिवराम माझी ने इसे पर्यावरण अनुकूल तकनीक के प्रभावी इस्तेमाल का उदाहरण बताया।