

हुगली : एक ओर लोकसभा में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ को लेकर चर्चा और राजनीतिक बयानबाजी जारी है, वहीं दूसरी ओर चूंचुड़ा स्थित ‘वंदे मातरम भवन’ उपेक्षा का शिकार है। साहित्य सम्राट बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय से जुड़ी इस ऐतिहासिक धरोहर के रखरखाव की स्थिति को लेकर स्थानीय लोगों और इतिहासकारों में चिंता है।
भवन के सामने स्थित बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की आवक्ष प्रतिमा लंबे समय तक खुले आसमान के नीचे थी। हाल ही में एक पुलिसकर्मी ने प्रतिमा के ऊपर छत अथवा आवरण की व्यवस्था करायी। इसे लेकर अब भवन की देखरेख की जिम्मेदारी को लेकर तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गया है।
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित ‘वंदे मातरम’ को भारत का राष्ट्रगीत माना जाता है। इस वर्ष इसके 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर देशभर में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे हैं। इसी बीच चूंचुड़ा स्थित उस भवन की बदहाल स्थिति चर्चा का विषय बन गयी है, जहां बंकिमचंद्र ने रहकर ‘रजनी’, ‘उपकथा’, ‘कृष्णकांतेर विल’ और ‘आनंदमठ’ जैसी महत्वपूर्ण रचनाओं से साहित्य जगत को समृद्ध किया।
वर्ष 1992 में पश्चिम बंगाल सरकार ने वंदे मातरम भवन का अधिग्रहण किया था। उचित रखरखाव के अभाव में भवन धीरे-धीरे जर्जर हो गया। वर्ष 1998 में इसकी मरम्मत करायी गयी थी, लेकिन बाद में एक बार फिर भवन को व्यापक जीर्णोद्धार की आवश्यकता महसूस होने लगी।
स्थानीय लोगों और इतिहासकारों की लंबे समय से मांग है कि भवन में बंकिमचंद्र की रचनाओं और जीवन से जुड़ा संग्रहालय बनाया जाए। हालांकि, अब तक यह योजना पूरी तरह साकार नहीं हो सकी है।
इधर, चूंचुड़ा के विधायक कुछ दिन पहले निरीक्षण दल के साथ वंदे मातरम भवन का दौरा कर चुके हैं। इससे स्थानीय लोगों में भवन के जीर्णोद्धार और इसे पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किये जाने की उम्मीद जगी है। लोगों का कहना है कि राजनीतिक बयानबाजी से आगे बढ़कर अब इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है।