हावड़ा में स्थापित हुआ था बंगाल का पहला सरस्वती मंदिर

1923 को हुई थी मंदिर की विधिवत स्थापना, शुक्रवार को हाेगी विशेष पूजा
हावड़ा में स्थापित हुआ था बंगाल का पहला सरस्वती मंदिर
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मेघा, सन्मार्ग संवाददाता

हावड़ा : आगामी शुक्रवार को सरस्वती पूजा है। बंगाल में मां सरस्वती का अलग महत्व है। इसे विद्या की देवी माना जाता है। हर वर्ष बसंत पंचमी के अवसर पर सरस्वती पूजा बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाई जाती है। स्कूलों, कॉलेजों और मोहल्लों में अस्थायी पंडालों में विद्या की देवी की आराधना होती है। लेकिन यह एक रोचक तथ्य है कि बंगाल में देवी दुर्गा, काली, शिव या कृष्ण की तरह देवी सरस्वती के स्थायी मंदिर बहुत कम हैं। ऐसे में हावड़ा में स्थित राज्य का पहला सरस्वती मंदिर अपने आप में एक अनूठी और ऐतिहासिक पहचान रखता है। हुगली नदी के पश्चिमी तट पर, हावड़ा के पंचाननतला रोड से सटे उमेशचंद्र दास लेन में स्थित यह पत्थर से निर्मित सरस्वती मंदिर लगभग एक सदी पुराना है। दास परिवार के अनुसार, यह बंगाल का पहला और लंबे समय तक एकमात्र ऐसा मंदिर था, जहां देवी सरस्वती की नियमित ‘नित्य पूजा’ होती है। आश्चर्य की बात यह है कि आज भी हावड़ा के कई स्थानीय लोग इस विरासत मंदिर के बारे में पूरी तरह से अवगत नहीं हैं। यह मंदिर वर्ष 1923 में स्थापित किया गया था। एक प्रधानाध्यापक ने की थी मंदिर की स्थापना : स्थापना का श्रेय शिक्षाप्रेमी उमेशचंद्र दास को जाता है, जो 1856 से 1887 तक हावड़ा जिला स्कूल के प्रधानाध्यापक रहे। शिक्षा के प्रति उनकी गहरी आस्था थी और वे चाहते थे कि विद्या की देवी का स्थायी रूप से पूजन हो। हालांकि, 1913 में उनके निधन के कारण वे अपने इस स्वप्न को साकार होते नहीं देख सके। उमेशचंद्र दास के पुत्र रणेशचंद्र दास ने अपने पिता की इच्छा को पूर्ण करते हुए जयपुर से श्वेत संगमरमर की भव्य प्रतिमा बनवाई। 20 मार्च 1919 को प्रतिमा हावड़ा लाई गई और पहले घर में पूजा आरंभ हुई। अंततः 28 जून 1923 को मंदिर की विधिवत स्थापना की गई। बाद में वर्ष 2001 में मंदिर का व्यापक नवीनीकरण किया गया।

मंदिर में पीले रंग का है महत्व : मंदिर की स्थापत्य कला भी दर्शनीय है। पीले रंग के शिखर पर त्रिशूल और चक्र दूर से ही दिखाई देते हैं। मंदिर की दीवारों के चारों कोनों पर पुष्प आकृतियां बनी हैं, जिनके पास देवी का वाहन हंस विराजमान है। वीणा और शंख की सुंदर नक्काशी, टेराकोटा की सजावट और पारंपरिक ‘कलका’ आकृतियां मंदिर की शोभा बढ़ाती हैं। गर्भगृह में स्थापित देवी सरस्वती की प्रतिमा, उनका वाहन हंस और वीणा—सब एक ही पत्थर से तराशे गए हैं। चार फीट ऊंची संगमरमर की प्रतिमा में देवी सरस्वती शांत और गरिमामय मुद्रा में खड़ी हैं। बसंत पंचमी के दिन उन्हें पीले रंग की ‘बसंती’ साड़ी पहनाई जाती है, जो ज्ञान और वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक मानी जाती है। इस दिन मंदिर को फूलों, मालाओं और रोशनी से भव्य रूप से सजाया जाता है। दास परिवार के सदस्य और आसपास के श्रद्धालु बड़ी संख्या में पूजा-अर्चना के लिए एकत्र होते हैं। आज भी यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि बंगाल की सांस्कृतिक और शैक्षणिक परंपरा का जीवंत प्रतीक भी है, जो आने वाली पीढ़ियों को ज्ञान, कला और संस्कारों की विरासत से जोड़ता है।


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