हावड़ा रेलवे स्टेशन : स्वतंत्रता, विभाजन और युद्धों का जीवंत साक्षी

पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से लाखों हिंदू शरणार्थी ट्रेनों से यहां पहुंचे द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सैन्य परिवहन का प्रमुख केंद्र था हावड़ा
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मेघा, सन्मार्ग संवाददाता

हावड़ा : कोलकाता के दिल में बसा हावड़ा रेलवे स्टेशन भारत के सबसे पुराने, सबसे व्यस्त और ऐतिहासिक स्टेशनों में से एक है। 1854 में स्थापित यह स्टेशन न केवल लाखों यात्रियों का रोजाना का पड़ाव है, बल्कि यह भारत के आधुनिक इतिहास की कई महत्वपूर्ण घटनाओं का प्रत्यक्ष साक्षी रहा है। हुगली नदी के किनारे बसा यह स्टेशन स्वतंत्रता संग्राम की गूंज, 1947 के विभाजन की त्रासदी, विश्व युद्धों की उथल-पुथल और राष्ट्र निर्माण की चुनौतियों को अपनी रेल पटरियों पर सहेजे हुए है। यहां से गुजरती हर ट्रेन के साथ इतिहास की एक नई कड़ी जुड़ती रही है, जो आज भी जीवंत है।

स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भावुक पल : 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ, लेकिन हावड़ा स्टेशन पर उस दिन एक अलग ही माहौल था। पूर्वी भारतीय रेलवे (ईआईआर) के जनरल मैनेजर जी. फारूक ने यहां एक भावुक भाषण दिया। उन्होंने कहा कि आजादी के साथ पुरानी यादें और घाव भी आए हैं, लेकिन अब सामूहिक प्रयास से राष्ट्र को मजबूत बनाना होगा। यह भाषण स्टेशन के उन कर्मचारियों और यात्रियों के लिए प्रेरणा बन गया, जो विभाजन की आग में झुलस रहे थे।

विभाजन की त्रासदी और शरणार्थियों का आश्रय : 1947 का विभाजन भारत के इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी रही और हावड़ा स्टेशन इसकी सबसे मार्मिक गवाही देता है। पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से लाखों हिंदू शरणार्थी ट्रेनों से यहां पहुंचे। स्टेशन परिसर वर्षों तक शरणार्थियों से ठसाठस भरा रहा—वे भोजन, कपड़े और आश्रय के अभाव में प्लेटफॉर्मों पर दिन-रात गुजारते थे। सियालदह स्टेशन के साथ हावड़ा भी इन विस्थापितों का प्रमुख केंद्र बना। रेलवे कर्मचारियों ने राहत समितियां बनाकर मदद की, लेकिन स्थिति इतनी विकट थी कि 1957 तक शरणार्थियों को पूरी तरह हटाया नहीं जा सका। ये दृश्य विभाजन की उस मानवीय पीड़ा को दर्शाते हैं, जहां परिवार बिखर गए और सपने टूट गए।

महात्मा गांधी की शांति यात्रा : विभाजन के बाद कलकत्ता में सांप्रदायिक हिंसा चरम पर थी। महात्मा गांधी ने शांति स्थापित करने के लिए अगस्त 1947 में हावड़ा स्टेशन पर कदम रखा। 9 अगस्त 1947 को वे यहां उतरे और दोनों समुदायों के नेताओं से शांति वार्ता की। बेलियाघाटा में रहते हुए उन्होंने उपवास और प्रार्थना सभाओं से हिंसा रोकने का प्रयास किया। यह दौरा गांधीजी के अहिंसा के संदेश का प्रतीक बना।

रवींद्रनाथ टैगोर की यात्रा : 1941 में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की अंतिम रेल यात्रा बोलपुर (शांतिनिकेतन) से हावड़ा तक सैलून कार में हुई। बीमार होने के कारण उन्हें आपातकाल में कलकत्ता लाया गया। यह उनकी आखिरी ट्रेन यात्रा थी—25 जुलाई 1941 को वे हावड़ा पहुंचे थे।

जवाहरलाल नेहरू का ऐतिहासिक दौरा और विद्युतीकरण : 1957 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने हावड़ा से सेवड़ाफुली तक पहली इलेक्ट्रिक ट्रेन का उद्घाटन किया। स्टेशन को दुल्हन की तरह सजाया गया था। नेहरू ने मजाक में इसे 'सबसे बेहतर विवाह मंडप' कहा। उस समय 13 वर्षीय राजीव गांधी भी अपने नाना जी के साथ मौजूद थे। यह घटना भारतीय रेलवे के आधुनिकीकरण का प्रतीक बनी।

युद्धों में हावड़ा की भूमिका : द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हावड़ा सैन्य परिवहन का प्रमुख केंद्र था। स्टेशन पर पर्दे लगाए गए और लिलुआ वर्कशॉप में बख्तरबंद वाहन बनाए गए। 1962 के चीन युद्ध और 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में भी यहां से सैनिकों और सामग्री की आवाजाही होती रही। युद्ध की विभीषिका में यह स्टेशन जीवन रेखा बना।

अन्य महान व्यक्तित्वों की छाप

- 1929 में शहीद जतिन दास का शव यहां लाया गया।

- 1928 में मोहम्मद अली जिन्ना यहां से लौटे।

- डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन और मदर टेरेसा (1975 में प्रेम निवास उद्घाटन) भी यहां पहुंचीं।

आज हावड़ा स्टेशन 23 प्लेटफॉर्मों वाला दुनिया के सबसे व्यस्त स्टेशनों में से एक है, जहां रोजाना लाखों यात्री आते-जाते हैं। यह न केवल यात्राओं का केंद्र है, बल्कि भारत की एकता, संघर्ष, पीड़ा और मानवता की प्रतीकात्मक कहानी भी बयां करता है। हावड़ा स्टेशन—एक जीवंत इतिहास, जो चलता रहता है।

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