

झाड़ग्राम : दुर्गापूजा की कई परंपराएं ऐसी हैं, जो पीढ़ियों से चली आ रही हैं और आज भी लोगों के लिए आस्था का केंद्र बनी हुई हैं। झाड़ग्राम के गोपीबल्लभपुर के जानाघाटी गांव में बक्सी परिवार की दुर्गापूजा भी ऐसी ही एक परंपरा है। इस वर्ष इस पूजा ने 164 वर्ष पूरे कर लिये हैं। इस पूजा की सबसे खास परंपरा दशमी की रात निभायी जाती है, जब परिवार के सदस्यों के हाथों में नील अपरजिता के फूलों की माला बांधी जाती है। परिवार के स्वगोत्रीय सदस्यों के मंगल और स्वस्थ जीवन की कामना के लिए अपरजिता पूजा की जाती है।
परिवार के अनुसार, करीब 164 वर्ष पहले श्रीहरि बक्सी को स्वप्नादेश मिला था। इसके बाद उन्होंने घर में दुर्गापूजा शुरू की। श्रीहरि बक्सी आयुर्वेदिक चिकित्सक होने के साथ ही बेहद मानवतावादी व्यक्ति थे। जरूरतमंदों की सेवा के लिए वे हमेशा तत्पर रहते थे और इलाके में उनकी काफी प्रतिष्ठा थी। लोककथा के अनुसार, अंजलि के समय उनके हाथ में अपने आप फूल आ जाते थे और उन्हीं फूलों से देवी को अंजलि दी जाती थी।
बताया जाता है कि बक्सी परिवार के पूर्वज कभी महांती परिवार के नाम से जाने जाते थे। उस समय गोपीबल्लभपुर मयूरभंज के राजाओं के अधीन था। सामाजिक कार्यों में परिवार के योगदान से प्रसन्न होकर तत्कालीन राजाओं ने उन्हें ‘बक्सी’ उपाधि दी थी। तभी से परिवार बक्सी परिवार के नाम से जाना जाने लगा।
बक्सी परिवार की दुर्गापूजा कालिका पुराण के अनुसार होती है। यहां पशु बलि की परंपरा नहीं है। हालांकि, कुम्हड़े या गन्ने की बलि देने की परंपरा आज भी निभायी जाती है। षष्ठी के दिन बेल वृक्ष का वरण करने के साथ पूजा की शुरुआत होती है।
सप्तमी की सुबह सुवर्णरेखा नदी से जल लाकर घर के मुख्य आंगन में घट स्थापित किया जाता है। मानकचू के पत्ते को वधू के रूप में सजाकर देवी स्वरूप में उसकी पूजा की जाती है। इसके बाद घट को मुख्य पूजा मंडप में प्रतिमा के सामने ले जाया जाता है।
इस पूजा की एक और खासियत यज्ञकुंड है। सप्तमी से दशमी तक प्रतिमा के सामने जलने वाला यज्ञकुंड विसर्जन से पहले तक बुझने नहीं दिया जाता। इस यज्ञकुंड को तैयार करने का काम भी पीढ़ियों से परिवार से जुड़े लोगों के वंशज ही करते आ रहे हैं।
बक्सी परिवार की पूजा में मां दुर्गा के साथ लक्ष्मी और सरस्वती की पूजा तो होती ही है, इसके अलावा देवी की सखियों जया और विजया की भी अलग से पूजा और अंजलि दी जाती है। पहले यह इस इलाके की एकमात्र दुर्गापूजा हुआ करती थी। आज भी झाड़ग्राम के अलावा झारखंड और ओडिशा से बड़ी संख्या में लोग यहां पूजा देखने और प्रसाद ग्रहण करने पहुंचते हैं।
कभी यहां पहुंचना भी आसान नहीं था। लोग सुवर्णरेखा नदी पार कर, यहां तक कि साइकिल कंधे पर उठाकर जानाघाटी स्थित बक्सी परिवार की पूजा देखने पहुंचते थे।
प्रतिमा विसर्जन के बाद दशमी की रात अपरजिता पूजा के साथ इस पारंपरिक पूजा का विशेष समापन होता है। परिवार के सदस्यों के हाथों में नील अपरजिता के फूलों की माला बांधी जाती है और सिर पर शांति का जल छिड़का जाता है। वर्तमान में श्रीहरि बक्सी के पौत्र चित्तरंजन बक्सी के साथ प्रदीप बक्सी, सुशांत बक्सी और प्रवीर बक्सी पूजा की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।