दधिमाधव मंदिर, अमरागिरी : टेराकोटा कला का अनमोल धरोहर

दधिमाधव मंदिर, अमरागिरी : टेराकोटा कला का अनमोल धरोहर
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मेघा, सन्मार्ग संवाददाता

हावड़ा : हावड़ा जिले के अमता-II ब्लॉक के अमरागिरी, झिकिरा और राउतारा गांव टेराकोटा शैली के प्राचीन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध हैं। इन्हीं में अमरागिरी स्थित दधिमाधव मंदिर क्षेत्र की सबसे सुसंरक्षित और आकर्षक धरोहरों में गिना जाता है। यह मंदिर राज्य सरकार द्वारा संरक्षित विरासत स्मारक है, जिसकी जानकारी मंदिर प्रांगण में लगे सूचना पट्ट से मिलती है। करीब 25 फीट ऊंचा यह दक्षिणमुखी मंदिर ‘आटछाला’ शैली में निर्मित है और इसके अग्रभाग में त्रि-प्रवेशीय बरामदा है। मंदिर का निर्माण 1686 शकाब्द (बंगाब्द 1171, अप्रैल–मई 1764 ई.) में रॉय परिवार द्वारा कराया गया था। यहां के प्रधान विग्रह दधिमाधव शालग्राम शिला हैं, जिनकी प्रतिदिन पूजा-अर्चना की जाती है। मंदिर एक ऊंचे चबूतरे पर स्थित है, जो क्षेत्र की अन्य प्राचीन मंदिर परंपराओं से मेल खाता है।

टेराकोटा पैनलों में रामायण और कृष्णलीला : मंदिर के तीनों अग्र पैनलों पर उत्कृष्ट टेराकोटा कारीगरी देखने को मिलती है, जो आज भी काफी हद तक सुरक्षित है। इन पैनलों में रामायण के प्रसंग—राम-रावण युद्ध, अशोकवन में सीता—और कृष्णलीला के दृश्य अंकित हैं। निचले आधार भाग में यूरोपीय जहाज और नाविक, घुड़सवार व हाथी पर शिकार के दृश्य, पालकी में सवार बाबू तथा तत्कालीन सामाजिक जीवन की झलकियां उकेरी गई हैं। ये चित्रण उस समय के समाज और यूरोपीय आगमन की कहानी भी बयां करते हैं। मंदिर की दीवारों पर देवी दुर्गा और उनके परिवार की प्रतिमाएं भी अंकित हैं, जो शिल्पकारों की बारीक कलात्मक दृष्टि को दर्शाती हैं। हालांकि आधार भाग के कुछ टेराकोटा पैनल समय के साथ क्षतिग्रस्त हो गए हैं।

द्वारपाल प्रतिमाएं आकर्षण का केंद्र : मंदिर के दो प्रवेश द्वार हैं—मुख्य द्वार दक्षिण दिशा में तथा दूसरा अपेक्षाकृत छोटा द्वार पश्चिम दिशा में। पश्चिमी द्वार के दोनों ओर द्वारपालों की प्रतिमाएं स्थापित हैं, जिनके हाथ क्रॉस मुद्रा में हैं और वे मानो मंदिर की रक्षा करते प्रतीत होते हैं। इन प्रतिमाओं पर चूने का लेप किया गया है। द्वारपाल प्रतिमाएं हावड़ा और आसपास के हुगली जिले के मंदिरों में विशेष रूप से देखने को मिलती हैं।

कैसे पहुंचे : कोलकाता से अमरागिरी की दूरी लगभग 55 किलोमीटर है। सड़क मार्ग से डेढ़ घंटे में यहां पहुंचा जा सकता है। निजी वाहन से जाना सबसे सुविधाजनक विकल्प है, क्योंकि गांव के भीतर मंदिरों तक पैदल पहुंचना बेहतर रहता है। हावड़ा बस स्टैंड से अमरागिरी के लिए बस सेवा उपलब्ध है, जिसमें लगभग दो घंटे का समय लगता है। इसके अलावा, हावड़ा से अमता तक लोकल ट्रेन (करीब 1 घंटा 45 मिनट) लेकर वहां से लगभग 12 किलोमीटर की दूरी सड़क मार्ग से तय कर अमरागिरी पहुंचा जा सकता है।

इतिहास, स्थापत्य और लोकजीवन की झलक को एक साथ समेटे दधिमाधव मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि बंगाल की टेराकोटा कला का जीवंत उदाहरण भी है। संरक्षण और संवर्धन के प्रयासों के बीच यह धरोहर आज भी अतीत की कहानियां सुनाती नजर आती है।


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