

मेघा, सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : आगामी विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में केंद्रीय और अर्द्धसैनिक बलों की तैनाती मार्च के पहले सप्ताह से शुरू होने की संभावना के बीच निजी बसों के अधिग्रहण को लेकर विवाद गहराने लगा है। ज्वाइंट काउंसिल ऑफ बस सिंडिकेट्स ने आरोप लगाया है कि उनकी मांगों पर चर्चा किए बिना ही सड़कों से बसें अधिग्रहित की जा रही हैं, जिससे परिवहन सेवा बाधित हो सकती है। संगठन के सचिव तपन बंद्योपाध्याय ने एक बयान में कहा कि 1952 से राज्य में हर चुनाव में निजी बसों का उपयोग होता आया है और बस मालिक हमेशा सहयोग करते रहे हैं। लेकिन उनकी जायज मांगों पर सरकार या चुनाव आयोग गंभीरता से विचार नहीं करता। बस संगठन का कहना है कि हाल ही में परिवहन मंत्री स्नेहाशीष चक्रवर्ती और परिवहन सचिव सौमित्र मोहन से इस मुद्दे पर बातचीत की मांग की गई थी, लेकिन अब तक कोई ठोस पहल नहीं हुई है। संगठन का आरोप है कि सरकार द्वारा तय किराये पर बसें देना अनिवार्य होता है, परंतु उस दर पर मालिकों को उचित पारिश्रमिक नहीं मिल पाता। साथ ही, कर्मचारियों को लगातार 24 घंटे ड्यूटी करने को कहा जाता है, लेकिन उन्हें पर्याप्त भत्ता या सुविधाएं नहीं मिलतीं, जिससे श्रमिक असंतोष भी बढ़ रहा है। संगठन ने यह भी सवाल उठाया है कि जब सरकार के पास अपनी बसें उपलब्ध हैं, तो उनका अधिग्रहण क्यों नहीं किया जाता। उनका दावा है कि किसी भी चुनाव में सरकारी बसों के अधिग्रहण का उदाहरण नहीं मिलता। निजी बसों के अधिग्रहण की स्थिति में पूरी जिम्मेदारी मालिकों पर आती है, जबकि सरकारी बसों के मामले में ऐसा नहीं होता। बस संगठनों ने आशंका जताई है कि यदि मार्च की शुरुआत से बड़े पैमाने पर अधिग्रहण जारी रहता है, तो आम यात्रियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है और दैनिक यात्रियों की मुश्किलें बढ़ेंगी। इसलिए सरकार और चुनाव आयोग के साथ शीघ्र समाधानकारी बैठक की मांग की गई है। अन्यथा, आवश्यकता पड़ने पर कानूनी कदम उठाने की चेतावनी भी दी गई है।हालांकि परिवहन विभाग के एक सूत्र ने कहा है कि फिलहाल बस अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू होने की बात निराधार है और इस विषय पर अभी कोई निर्णय नहीं लिया गया है।