

मेघा, सन्मार्ग संवाददाता
हावड़ा : हावड़ा और हुगली जिलों के बीच बहने वाली सरस्वती नदी कभी बंगाल की जीवनरेखा मानी जाती थी। इसी नदी के किनारे स्थित था ऐतिहासिक सप्तग्राम बंदरगाह, जो मध्यकाल में बंगाल का प्रमुख व्यापारिक केंद्र था। एक समय इस नदी से बड़े-बड़े जहाजों का आवागमन होता था, लेकिन आज हालत यह है कि इसमें डोंगी चलाना भी मुश्किल हो गया है। सरस्वती नदी आज कचरे, जलकुंभी और गाद से पूरी तरह पट चुकी है। नदी को पाटकर उसके ऊपर घर, दुकान, बाजार और सड़कें बना दी गई हैं। डोमजूड़, सांकराइल, चंडीतल्ला सहित कई इलाकों में नदी का प्राकृतिक फैलाव सिमटकर कहीं-कहीं मात्र 15–20 फीट रह गया है। आसपास के इलाकों के गंदे नाले का पानी सीधे सरस्वती में गिर रहा है, जो आगे जाकर हुगली नदी को भी प्रदूषित कर रहा है। इसका असर गंगा की जैव विविधता पर भी पड़ रहा है।
इतिहासकारों के अनुसार, सरस्वती कभी गंगा की मुख्य धारा थी और ताम्रलिप्त बंदरगाह को दक्षिण बंगाल से जोड़ने वाला अहम जलमार्ग थी। 1505 ईस्वी के भूकंप के बाद नदी का मार्ग बदल गया और धीरे-धीरे इसकी नौवहन क्षमता खत्म हो गई। इसके साथ ही सप्तग्राम बंदरगाह का महत्व भी समाप्त हो गया। हालांकि अब उम्मीद की किरण दिख रही है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण के निर्देश पर राज्य सरकार सरस्वती नदी के प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) बनाने जा रही है। केएमडीए ने इसके लिए डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करने का काम शुरू कर दिया है। भविष्य में बिना शोधन के नदी में गंदा पानी छोड़ने पर रोक लगेगी और सिंचाई विभाग द्वारा नदी की खुदाई कर इसका प्रवाह बढ़ाने की योजना है। स्थानीय नागरिकों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का मानना है कि यदि अवैध निर्माण हटाकर नदी के दोनों मुहानों को मुक्त किया जाए, तो सरस्वती नदी एक दिन फिर अपनी पहचान वापस पा सकती है।