526 साल पुरानी परंपरा, ज‍हां बाघ पर सवार होती हैं मां दुर्गा, मुगल सम्राट जहांगीर भी भेजते थे पूजा सामग्री

526 साल पुरानी परंपरा, ज‍हां बाघ पर सवार होती हैं मां दुर्गा, मुगल सम्राट जहांगीर भी भेजते थे पूजा सामग्री
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दुर्गापुर की लायेक बाड़ी में 526 साल पुरानी दुर्गापूजा, सिंह नहीं बाघ है मां दुर्गा की सवारी

दुर्गापुर: पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर के गोपालपुर स्थित लायेक बाड़ी की दुर्गापूजा इतिहास, लोककथा और पारिवारिक परंपराओं का अनोखा संगम है। करीब 526 वर्ष पुरानी इस पूजा को लेकर मान्यता है कि मुगल सम्राट जहांगीर के समय भी यहां की पूजा के लिए सामग्री भेजी जाती थी। आज भी परिवार उसी पुरानी परंपरा और रीति-रिवाजों के अनुसार मां दुर्गा की आराधना करता है।

लायेक बाड़ी की दुर्गा प्रतिमा की सबसे खास बात इसका स्वरूप है। यहां मां दुर्गा सिंह पर सवार नहीं होतीं, बल्कि **बाघ पर विराजमान रहती हैं।** यानी यहां देवी का स्वरूप ‘व्याघ्रवाहिनी’ है। प्रतिमा की सजावट भी बेहद अलग है। मां को सोने के आभूषणों के बजाय मिट्टी से बने गहनों से सजाया जाता है।

इस बाड़ी में शाक्त मत के अनुसार पूजा होती है। परिवार के बुजुर्गों के अनुसार, कभी यहां नरबलि की प्रथा भी थी, हालांकि अब वह नहीं होती। वर्तमान में बलि की परंपरा जारी है। अष्टमी के दिन एक सफेद बकरे और नवमी को दो बकरों की बलि दी जाती है।

पूजा की प्रक्रिया में भी कड़े नियम हैं। पुरोहित पूजा के आसन पर बैठने के बाद पूजा पूरी होने तक आसन नहीं छोड़ सकते। चारों दिनों मां को अन्नभोग नहीं लगाया जाता। लूची, चिउड़ा, दूध और अन्य सामग्री का भोग चढ़ाया जाता है। परिवार की महिलाएं और सदस्य स्वयं नारियल के लड्डू समेत विभिन्न प्रसाद तैयार करते हैं।

इस पूजा से एक लोककथा भी जुड़ी है। कहा जाता है कि कभी देवी की प्रतिमा को पूरे गांव में घुमाया गया था। इसके बाद गांव में आग लगने की घटना हुई। तभी से प्रतिमा को गांव में घुमाने की परंपरा बंद कर दी गई। पीढ़ियों से चली आ रही इस मान्यता का आज भी पालन किया जाता है।

परिवार के सदस्य कंचन लायेक के अनुसार, 526 साल से चली आ रही परंपराओं को आज भी उसी तरह निभाने की कोशिश की जाती है। मां का स्वरूप, पूजा की विधि और भोग—हर चीज में पूर्वजों की विरासत को सुरक्षित रखने का प्रयास है। अब यह पूजा केवल लायेक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे गोपालपुर के लोगों की आस्था और भावनाओं से जुड़ी परंपरा बन चुकी है।

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