

प्रश्न : हम आपसे द केरल स्टोरी के समय मिले थे। अब आप 'चरक' लेकर आए हैं। क्या यह साफ कर दें कि यह केरल स्टोरी 2 नहीं है ?
सुदीप्तो सेन : जी हाँ, बिल्कुल साफ कर दूँ - 'चरक' मैं डायरेक्ट और प्रोड्यूस कर रहा हूँ, यह केरल स्टोरी 2 नहीं है। लोगों में काफी भ्रम है क्योंकि वे मुझे हर “केरल” नाम वाली फिल्म से जोड़ देते हैं। लेकिन यह मेरा सचेत निर्णय था कि मैं आगे बढ़ूँ और कुछ अलग करूँ।
प्रश्न : “चरक” का क्या मतलब है? फिल्म किस विषय पर आधारित है ?
सुदीप्तो सेन : चरक एक बहुत लोकप्रिय लोक-उत्सव है, जो पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा, झारखंड, तमिलनाडु और पूर्वी कर्नाटक के कुछ हिस्सों में मनाया जाता है। यह हमारे बचपन की यादों से जुड़ा हुआ है।
इस उत्सव के दो पहलू हैं :
1. उत्सव का रंगीन पक्ष- संगीत, नृत्य, रंग, भक्ति और उल्लास ।
2. रहस्यमय/अंधविश्वासी पक्ष- माँ काली और भगवान शिव की उपासना से जुड़े तांत्रिक और अघोरी प्रथाएँ ।
कुछ परंपराओं में शरीर छेदन, खोपड़ी से जुड़े अनुष्ठान, यहाँ तक कि मानव बलि जैसी मान्यताओं की कहानियाँ भी जुड़ी रही हैं । बचपन में मैंने इस दुनिया को देखा है । एक फिल्मकार और जिम्मेदार नागरिक के रूप में मुझे लगा कि आस्था और अंधविश्वास के इस द्वंद्व पर बात होनी चाहिए ।
प्रश्न : आपने फिल्म में VFX का उपयोग लगभग नहीं किया है। क्या यह जानबूझकर किया गया फैसला था ?
सुदीप्तो सेन : बिल्कुल। चरक में जो भी दिखेगा, वह वास्तविक है। हमने असली चरक उत्सव के दौरान शूट किया है। कोई VFX नहीं । आजकल फिल्मों में VFX का बहुत इस्तेमाल होता है, लेकिन मैं मानता हूँ कि अगर कहानी मजबूत है तो तकनीक की ज़रूरत नहीं । जैसे हमारे दादा-दादी की कहानियाँ - आप गणित के फॉर्मूले भूल सकते हैं, लेकिन वो कहानियाँ नहीं भूलते ।
प्रश्न : फिल्म में अंधविश्वास और कुछ हिंसक दृश्य हैं। क्या आपको लगता है कि इससे नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है?
सुदीप्तो सेन : कभी-कभी सच्चाई दिखाने के लिए लोगों को असहज करना पड़ता है। अगर कोई बहस नहीं होती, कोई असहमति नहीं होती, तो इसका मतलब है कि आपने मुद्दे को छुआ ही नहीं । बिना फिल्म देखे उसे जज करना खतरनाक है। मेरा उद्देश्य अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि उस पर सवाल उठाना है ।
प्रश्न : पोस्टर्स और विज़ुअल्स में बहुत गहराई और रंग दिखाई देते हैं । इसके पीछे क्या प्रेरणा थी ?
सुदीप्तो सेन : मेरे बचपन की यादें - रंग और संगीत। माँ काली के मुखौटे, उनके चमकीले रंग, गाँवों में खुले मैदानों में होने वाला आयोजन - सब कुछ बहुत जीवंत होता था। लोग एक दिन पहले से मेकअप करते थे, प्राकृतिक रंगों का उपयोग होता था । फिल्म में कुछ हिंसक दृश्य हैं, लेकिन आपको दृश्य कम और उसका विचार ज्यादा डराएगा। असली डर फिल्म की थीम में है ।
प्रश्न : क्या आपने 'चरक' को फिल्म फेस्टिवल्स में भेजा ?
सुदीप्तो सेन : हमने फ्रांस के एक प्रतिष्ठित फेस्टिवल में इसे दिखाया, जहाँ इसे पाँच पुरस्कार मिले। दर्शकों की प्रतिक्रिया शानदार रही। लेकिन मैंने जानबूझकर बहुत सारे फेस्टिवल्स में नहीं भेजा। मैं बतौर निर्माता बॉक्स ऑफिस पर खुद को परखना चाहता था।
प्रश्न : राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता होने के कारण क्या आप दबाव महसूस करते हैं ?
सुदीप्तो सेन : कुछ हद तक, हाँ । अब लोग मुझे ध्यान से देखते हैं। मेरी बातों और काम की जांच होती है । इससे जिम्मेदारी बढ़ती है। लेकिन मेरा काम है अच्छा सिनेमा बनाना ।
प्रश्न : यह आपका पहला प्रोडक्शन वेंचर है । एक निर्माता के रूप में क्या सीख मिली ?
सुदीप्तो सेन : मैं फिजूलखर्ची नहीं करना चाहता था, लेकिन बजट लगभग 30% बढ़ गया। मैंने सीखा कि आप या तो अच्छे निर्माता बन सकते हैं या अच्छे इंसान - दोनों होना कठिन है । मैंने अच्छा इंसान बनने का फैसला किया।
प्रश्न : द केरल स्टोरी के बाद इंडस्ट्री का रवैया कैसा रहा ?
सुदीप्तो सेन : अधिकतर बातचीत सकारात्मक रही। मेरी टीम ने कहा कि उन्होंने मेरे साथ काम करके बहुत सीखा । यह मेरे लिए संतोष की बात है ।
प्रश्न : आपकी अगली फिल्म भी महिलाओं से जुड़ी होगी ?
सुदीप्तो सेन : हाँ, मेरी अधिकतर फिल्में महिलाओं के मुद्दों पर आधारित हैं। अगली फिल्म उन लड़कियों पर है जो हर साल मुंबई आती हैं और उनके साथ क्या होता है। यह टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के शोध पर आधारित है।
प्रश्न : क्या आप खुद को नारीवादी मानते हैं?
सुदीप्तो सेन : नारीवाद स्वाभाविक है। हम सब अपनी माँ की संतान हैं। मेरी माँ और बड़ी बहन का मुझ पर गहरा प्रभाव है। हाँ, मेरे भीतर एक स्त्री है - जो महिलाओं के दर्द को समझती है।
प्रश्न : आपने 'केरल स्टोरी 2' डायरेक्ट क्यों नहीं की ?
सुदीप्तो सेन : मैंने पहली फिल्म इसलिए बनाई क्योंकि मुझे लगा कि उस मुद्दे पर बोलना मेरी जिम्मेदारी है। अगर कहानी किसी और राज्य या संदर्भ में जाती है, तो वह किसी और की रचनात्मक यात्रा है।
प्रश्न : अंत में, 'चरक' के बारे में एक पंक्ति ?
सुदीप्तो सेन : 'चरक' आस्था और अंधविश्वास के बीच की रेखा पर खड़ी फिल्म है। आप दृश्य से कम, विचार से ज्यादा डरेंगे।
-लिपिका वर्मा