गीता का वास्तविक ज्ञान

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राजा भोज एक कुशल प्रशासक तो थे ही, वे एक विद्वान व्यक्ति भी थे। उन्हें धर्मग्रन्थों का ज्ञान था । वे दरबार में आये पंडितों व कलाकारों का बड़ा सम्मान करते थे। प्रोत्साहित करने के लिये वे उन्हें सम्मानित और पुरस्कृत करते रहते थे।

एक बार उनके दरबार में गणेशदत्त नाम के ब्राह्मण पधारे । वे कुछ लालची और लोभी प्रवृत्ति के थे । दरबार में पधारने का उनका मुख्य उद्देश्य पुरस्कार रूप में अच्छी खासी धनराशि प्राप्त करना था । उन्होंने राजा भोज से कहा - 'राजन्, मैंने भगवत् गीता का वर्षों तक निरन्तर गहन अध्ययन और मनन किया है। एक-एक श्लोक को अनेक बार पढ़ा और समझा है। मुझे गीता का पूर्ण ज्ञान है। मेरी इच्छा है कि आपको गीता की कथा सुनाऊं तथा उसके गूढ़ अर्थों को स्पष्ट करूं। इसी आशय को लेकर मैं दरबार में उपस्थित हुआ हूं।'

ब्राह्मण की बात सुनकर राजा भोज मुस्कुराये। वे ब्राह्मण के कथन को सुनकर उसके पीछे छिपी वास्तविकता को जान गये थे, इसलिये उन्होंने ब्राह्मण से कहा - 'विप्रदेव आप धन्य हैं कि आपने गीता का गहन अध्ययन करके श्रेष्ठ ज्ञान की प्राप्ति की है किन्तु मेरा आपसे निवेदन है कि अभी आप कुछ और समय गीता का अध्ययन करें जिससे आप उसमें पूर्ण रूप से पारंगत हो जायें।'

भरे दरबार में राजा का ऐसा कथन ब्राह्मण देवता को बड़ा अपमानजनक लगा । उनकी विद्वता पर इस तरह आक्रमण करने का सीधा अर्थ था कि उनके गीता का ज्ञान अभी अधकचरा है। उन्होंने राजा की बात पर कोई प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की। बस मन ही मन राजा की अज्ञानता को कोसा और चुपचाप वहां से लौट पड़े लेकिन उनके मन में अर्थ प्राप्ति का लोभ अभी भी पहले की तरह विद्यमान था ।

कुछ समय के पश्चात् लोभ की प्रवृत्ति के कारण ब्राह्मण एक दिन फिर दरबार में जा पहुंचे और राजा से बोले - 'महाराज, आपके परामर्शानुसार मैंने गीता का अध्ययन दोबारा किया है। इस बार मैं पूर्ण पारंगत होकर आपके सम्मुख उपस्थित हुआ हूं। आप मुझे उचित समय और स्थान बतायें जहां मैं गीता की कथा आरम्भ करूं।'

राजा भोज गीता ज्ञान के पीछे छिपी हुई ब्राह्मण की लालची नीयत को अच्छी तरह समझ गये थे, इसलिये उन्होंने ब्राह्मण से कहा - 'सच बात तो यह है विप्रदेव कि आपका भागवत् ज्ञान अभी भी पूरा नहीं है। यदि आप अधूरा ज्ञान रहते मुझे कथा सुनाएंगे तो मेरा ज्ञान भी आधा अधूरा ही रहेगा। इसलिए मेरा निवेदन है कि आप गीता का अध्ययन पूरी तरह मन रमा कर करें। ऐसा करने से आपको विषय की पूर्णता प्राप्त होगी। उसके बाद आप मुझे गीता की कथा सुनायें।'

ब्राह्मण गणेशदत्त को भरे दरबार में फिर से अपमान के ज़हर का घूंट पीना पड़ा। भीतर ही भीतर ब्राह्मण देवता में क्रोध उबल रहा था। उनके दिमाग में 'अपमान, घोर अपमान' शब्द बार बार गूंज रहे थे। वे वहां अधिक देर नहीं टिके और राजा को मन ही मन 'मूर्ख' कहकर घर की तरफ चल पड़े। उन्होंने निश्चय कर लिया था कि अब जो भूल हो गई, सो हो गई। आगे से वे कभी भी दरबार में नहीं आयेंगे ।

घर पहुंचते उनका क्रोध शान्त हो गया था। शान्त मन से उन्होंने सोचा तो अंतर्मन से आवाज़ आई - 'तुम लोभवश राजदरबार में गये, इसलिए तो तुम्हारा अपमान हुआ ।'

ब्राह्मण की समझ में बात आ गई। उन्होंने सोचा कि राजा के स्थान पर अगर भगवान श्री कृष्ण का आसरा लिया होता तो मन यों अशान्त न होता और मन में इस तरह के विकार न पनपते। मन से लोभ और लालच को निकाल फेंकने में ही कल्याण निहित है। फिर वह राजा के पास नहीं गये और सब कुछ भूलकर पूर्ववत् अपने कार्यों में लग गये।

काफी समय बीत जाने के पश्चात् जब ब्राह्मण राजदरबार में नहीं आये तो एक दिन राजा भोज ने उन्हें बुलाने के लिये अपना दूत भेजा लेकिन ब्राह्मण गणेशदत्त ने दूत को राजदरबार में जाने के लिये मना कर दिया, कहा - ' राजा से कहना कि जिस लोभवश मैं राजदरबार में जाता था, मैंने उसे मार दिया है।'

राजा भोज स्वयं ही ब्राह्मण के द्वार पर आये और कहा ''विप्रदेव, श्री भागवत गीता का ज्ञान आपने अब पूरा किया है। तब आप में लोभ समाया हुआ था जिस कारण आप दरबार में आते थे। अब आप लोभ को समाप्त करके निर्लोभी हो गये हैं, इसीलिये मैं आपके स्वयं पास आया हूं।

ब्राह्मण गणेशदत्त ने अपनी भूल पर पश्चाताप् करते हुए इतना ही कहा - 'आप ठीक कहते हैं राजन्।'

परशुराम संबल(उर्वशी)

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