रोचक है पतंगबाजी का इतिहास

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रोचक है पतंगबाजी का इतिहासपतंगबाजी
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प्रिय बच्चों, आकाश में लहराती, इठलाती पतंगों को देखकर आपका मन भी अवश्य हिचकौले खाता होगा। बस! दिल करता है कि सारा दिन पतंग व डोर लेकर पतंगें उड़ाते रहें लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि पतंगबाजी का रोचक इतिहास क्या है? पतंग उड़ाना न केवल मनोरंजन का साधन है अपितु यह एक ऐसी कला है जिसमें हर शौकीन भी रंग जाता है। पतंगें उड़ाने की प्रथा न केवल भारत में ही है बल्कि समूचे विश्व में प्रचलित है। 

पतंग का अविष्कार कब और किसने किया था यह कोई नहीं जानता। ऐसा माना जाता है कि ईसा से लगभग चार सौ वर्ष पूर्व इसके उद्भव की जानकारी मिलती हैं। इसी तरह यह भी कहा जाता है कि सबसे पहले पतंग चीन में बना कर उड़ाई गयी थी। एशिया और न्यूजीलैंड की जंगली जातियांे में भी इसका प्रचार व प्रसार था। वैसे ग्रीक वैज्ञानिक आकाईटाज को ईसा से चौथी शताब्दी पूर्व पतंग का आविष्कारक माना जाता है। चीन के सेनापति हानसिक ने भी ईसा से 206 वर्ष पूर्व में पतंग की खोज की थी। इस वजह से चीन में आज भी प्रतिवर्ष नौवें माह की नौ तारीख को पतंग दिवस मनाया जाता है। यहां पतंग को धार्मिक प्रसंग से जोड़कर ऐसा यहां के धर्मगुरूओं में विश्वास है कि पतंग उड़ाने से प्रेत आत्माएँ विचरण नहीं करती हैं व हवा भी शुद्ध हो जाती है। 

पतंगबाजी के संबंध में इतिहासकारों की मानें तो 9500 ई.से पूर्व पतंग का प्रचलन नहीं था, हां सातवीं शताब्दी में पतंग उड़ाने की प्रथा मुस्लिम देशों में पहुँच चुकी थी। हिन्दुस्तान में पतंगबाजी को सर्वप्रथम नवाबों और रईसों ने अपनाया था। इसके बाद ही भारत व पड़ोसी देश के लोग पतंग उड़ाने लगे। नवाबों के समय में पतंग उड़ाने की बड़ी-बड़ी प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती थीं। शाही जमाने में पतंगबाजी के मुकाबले जीतने वालों को रत्नजड़ित पतंग पुरस्कार स्वरूप दी जाती थी। 

पतंगबाजी के साथ ऐतिहासिक व वैज्ञानिक घटनाएं जुड़ी हुई हैं ऐसा कहा जाता है कि कोरियाई देश के सेनापति ने युद्ध में हारती अपनी सेवा का मनोबल बढ़ाने के लिए पतंग के साथ जलती लालटेन उड़ाई थी जिसे सैनिकों ने पवित्र आत्मा का सितारा जानकार पूरे मनोबल से युद्ध किया इसके बाद यहां पर भी पतंगें उड़ायी जाने लगीं। टेलीफोन की खोज करने वाले अलेक्जेंडर बेल ने एक ऐसी पतंग बनाई थी जो एक बन्द बक्सेनुमा थी। पतंग में रेडियो एंटिना लगाकर हवा में छोड़ दिया जाता था जिससे रेडियो की ध्वनि साफ सुनाई देती थी। सन् 1901 में मारकोनी ने रेडियों सिग्नल को अटलांटिक पार भेजने के लिए पतंग को ही प्रयोग में लाया था। पतंग द्वारा ही बैंजामिन फ्रेंकलिन ने प्रयोग कर सिद्ध किया था कि बिजली में रोशनी का पता लगाया जा सकता है। 

यूं तो कागज की खोज से पूर्व भी पतंगें उड़ाई जाती थीं जिन्हें पत्तियों से बनाया गया था। फ्रांस तथा इंग्लैण्ड में तो सन् 1725 में 3 से 10 फुट की पतंगों के माध्यम से बग्गियां चलाई गयी थीं। इनमें सवारियों को बैठाकर कई मील तक ले जाया जाता था तो वायुयान बनाने वाले राइट बंधुओं ने भी प्रायोगिक तौर पर पतंग का ही सहारा लिया था। 

आज पतंगबाजी चीन, कोरिया, भारत, थाइलैण्ड, जापान, पाकिस्तान, बांग्लादेश समेत केई देशों में मशहूर है। 8100 वर्ग मीटर में बना दुनिया का सबसे बड़ा काइट म्यूजियम वीफैंग हैं। इसके अलावा भी कई देशों में पतंग संग्रहालय है जापानी पतंगे पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। जापान के एक पतंगबाज ने 11284 पतंगे एक साथ बांधकर उड़ाई थी। सबसे बड़ी पतंग 3801 मीटर की थी तो सबसे छोटी पांच मिमी. की पतंग भी उड़ाई जा चुकी है। 180 घंटे तक उड़ने वाली पतंगें भी बन चुकी हैं। 

 हमारे देश में पतंगों के शौकीन राजा महाराजा भी थे। जयपुर में पतंगबाजी की शुरूआत महाराजा सवाई रामसिंह की देन थी। जयपुर की पतंगें व मांजा पूरे देश में प्रसिद्ध है। भारत में मकरस क्रांति पर्व के साथ पतंगबाजी जुड़ी हुई है इस दिन पूरे देश में पतंगें उड़ाई जाती हैं वो काटा, वो मारा तथा चली-चली रे पतंग मेरी चली रे...की गूंज से जनमानस खुशियों में डूब जाता है। (सुमन सागर) 

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