

श्री निवास शास्त्री अपने समय के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति और सामाजिक कार्यकर्ता थे। उनका प्रारम्भिक जीवन गरीबी में कटा था। इसलिये वे जानते और समझते थे कि आर्थिक तंगी भरा जीवन कितना दूभर होता है। छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा करने के लिये भी तरसना पड़ता है। इसी कारण किसी की बेबसी और गरीबी को देखकर उनका हृदय पसीज़ जाता था।
समर्थ होने पर भी वे अपने बीते दिनों के कड़वे अनुभवों को भुला नहीं पाये थे। अपनी उदारता, सहृदयता और नम्र स्वभाव के कारण ही लोगों के दिल में उनके प्रति बड़ा आदर और सम्मान था। उनके जीवन की एक घटना उस समय की है जब वे विश्वविद्यालय के कुलपति थे।
एक बार कुछ विद्यार्थी इकट्ठे होकर उनके कार्यालय में आये। श्री निवास शास्त्री जी ने उनके आने का कारण पूछा तो उनमें से एक ने कहा-’महोदय, हम निर्धन विद्यार्थी हैं। जैसे तैसे करके हमारे माता-पिता पढ़ाई और भोजन के लिये पैसे जुटा पाते हैं। ऐसे में हमारे अध्यापकों द्वारा लगाया गया जुर्माना भर पाना हमारे बूते से बाहर है। हमारे विनय करने पर भी उन्होंने जुर्माना माफ़ नहीं किया। इसीलिये विवश होकर आपसे निवेदन करने के लिये आये हैं कि हम पर लगाया गया जुर्माना माफ़ कर दिया जाये। आपकी अत्यधिक कृपा होगी।’
शास्त्री जी छात्रों की ओर देखकर सरल भाव से मुस्कुराये और बोले-‘तुम लोगों ने अवश्य ही कोई ऐसा काम किया होगा जिसकी वजह से तुम पर जुर्माना किया गया है अन्यथा अध्यापक बिना किसी कारण के तो जुर्माना करेगा नहीं। उनमें तो अपने हर छात्र के प्रति क्षमा और दयाभाव होता है। किसी के प्रति द्वेषभाव या अन्याय की भावना तो उनमें होती ही नहीं। खैर, तुम्हारी आर्थिक मज़बूरी के कारण इस बार मैं तुम्हें जुर्माना देने से मुक्त करता हूं। हां, भविष्य में कभी अपने अध्यापकों को जुर्माना करने का अवसर मत देना।’ कहकर उन्होंने विद्यार्थियों के सम्मिलित प्रार्थना पत्र पर लिख दिया कि इस बार उन्हें विशेष कारणों से जुर्माना देने से मुक्त किया जाता है।
जब शास्त्री जी के द्वारा जुर्माना माफ करने की बात अध्यापकों के कान में पड़ी तो वे खीज उठे। अपने आप को अपमानित सा समझ कर वे सभी शास्त्री जी के पास पहुंचे और बोले- ‘श्रीमान्, हम लोगों ने उचित और आवश्यक जानकर विद्यार्थियों पर जुर्माना किया था परन्तु आपने उसे माफ करके उनका हौसला और भी बढ़ा दिया। इससे तो विद्यार्थियों में अनुशासनहीनता उत्पन्न होगी। जब उनके हृदय से जुर्माना देने का भय निकल जायेगा तो अध्यापकों के प्रति आदर की भावना भी समाप्त हो जायेगी।’
अध्यापकों की बात सुनकर शास्त्री जी गम्भीर हो गये। कुछ देर के लिये वे गहरी सोच में खो गये। फिर वे अध्यापकों से बोले-मैं मानता हूं कि आप लोग जो भी कह रहे हैं वह बिल्कुल सही है परन्तु जब मैं किसी की निर्धनता और बेबसी को देखता हूं तो भावुक हो जाता हूं और कठोर नियमों को लचीला बना देता हूं।
जब भी कोई मजबूर और निर्धन व्यक्ति मेरे सम्मुख आकर अपनी गरीबी का रोना रोता है तो मुझे उसी समय अपने बीते दिन याद आ जाते हैं। जब मैं छोटा था तो बहुत निर्धन था। पैसे के लिये तरसता था।
एक बार स्कूल में समारोह था। सभी विद्यार्थियों को साफ धुले कपड़े पहन कर स्कूल आना था लेकिन उस दिन साबुन लाने के लिये एक आना भी मेरी मां के पास नहीं था। मैले कपड़े पहन कर ही मुझे स्कूल जाना पड़ा।
अध्यापक के आदेश का पालन न करने पर मुझ पर आठ आने जुर्माना कर दिया। जब मेरी स्थिति एक आने का साबुन खरीदने की नहीं थी तो भला आठ आना जुर्माना कहां से भरता? अपनी उस स्थिति को याद करके मैं इतना भावुक हो जाता हूं। भावुकता में बहकर मैं नियमों की कट्टरता को भूल जाता हूं। आखिर भावुकता का भी तो हमारे जीवन में कोई स्थान है। भावुकता भरे माहौल में अध्यापक गण भी भावुक हो गए और चुपचाप चल दिये। परशुराम संबल(उर्वशी)