राजेश खन्ना का करिश्माई दौर बन गया अमर

स्मृति दिवस (18 जुलाई) पर विशेष
Rajesh Khanna
राजेश खन्ना
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ट्रेजिडी किंग दिलीप कुमार, यूथ आइकॉन देवानंद और आला शोमैन राज कपूर यक़ीनन अव्वल दर्ज़े के अदाकार रहे। लेकिन इनमें से किसी को भी 'सुपरस्टार' का रुतबा हासिल नहीं था। यह सेहरा आज भी जतीन खन्ना उर्फ़ राजेश खन्ना उर्फ़ 'काका' के सिर बंधा हुआ है।

हिंदी सिनेमा के पहले 'सुपरस्टार' राजेश खन्ना के 14वें स्मृति दिवस पर सिर चढ़ बोलता उनका 'स्टारडम' फिर याद आ गया। कहना न होगा कि ट्रेजिडी किंग दिलीप कुमार, यूथ आइकॉन देवानंद और आला शोमैन राज कपूर यक़ीनन अव्वल दर्ज़े के अदाकार रहे। लेकिन इनमें से किसी को भी 'सुपरस्टार' का रुतबा हासिल नहीं था। यह सेहरा आज भी जतीन खन्ना उर्फ़ राजेश खन्ना उर्फ़ 'काका' के सिर बंधा हुआ है। सच कहा जाये, तो इनकी शख़्सियत में गहरे पैठ उनके बारे में बहुत कुछ अनकहा रह गया है। फिर भी जाने-माने अख़बारनवीस और लेखक यासिर उस्मान की लिखी पेंगुइन बुक्स से निकली राजेश खन्ना की बॉयोग्रॉफी 'कुछ तो लोग कहेंगे' उनके शानदार फिल्मी सफ़र, अभूतपूर्व स्टारडम, फिल्मी दुनिया की चकाचौंध के पीछे छिपे उनके अकेलेपन, निजी ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं और उनके ढलान का दर्दनाक अफ़साना शिद्दत से बयां करने में सानी नहीं रखती है। यह किताब कैसे उनके स्टारडम की क़द्रदान दीवानगी की हद से गुज़रते हुए उन्हें ख़ून से ख़त लिखा करतीं और उनकी सफेद कार पर चूमने के निशान चस्पां करती रहीं की परतें भी उधेड़ती जाती हैं। कार से उड़ती धूल से मांग भर्ती हसीनाओं के कारनामों के चर्चे तो आम बात हो गयी थी।

'राजेश खन्ना जो भी हों, सबसे अलहदा इनसान थे। मुख़्तसर वक़्त में जिस बुलंदी को उन्होंने अपनी मुट्ठी में क़ैद कर रखा था, उस दौर के किसी भी एक्टर के लिए नामुमकिन ही था। अव्वल तो आज के मशहूर हीरो सलमान खान को भी स्टारडम का ऐसा जलवा बिखेरना नसीब नहीं।' -सलीम-जावेद

सलीम-जावेद जोड़ी के स्क्रीनप्ले राइटर सलीम खान इस किताब की भूमिका में उनकी नज़र से काका की अहमियत को बेलौस और बेबाक अंदाज़ में बयां करते हुए लिखते हैं, 'राजेश खन्ना जो भी हों, सबसे अलहदा इनसान थे। मुख़्तसर वक़्त में जिस बुलंदी को उन्होंने अपनी मुट्ठी में क़ैद कर रखा था, उस दौर के किसी भी एक्टर के लिए नामुमकिन ही था। अव्वल तो आज के मशहूर हीरो सलमान खान को भी स्टारडम का ऐसा जलवा बिखेरना नसीब नहीं।' वे आगे बताते हैं, 'साउथ के दर्शक हिंदी फिल्में कम ही देखा करते हैं। क्यूंकि उनके अपने ही बेशुमार हरदिल अजीज़ हीरो भरे पड़े हैं। बावजूद इसके उनके बीच 'हाथी मेरे साथी' की चेन्नई में शूटिंग के दौरान राजेश खन्ना के बेइंतहा जलवे को मैंने क़रीब से देखा। यह दीगर बात है, महज़ चार-पांच साल में बुलंद मुक़ाम हासिल करने का रिकॉर्ड बनानेवाले इस सुपरस्टार को आख़िरकार अपनी भूलों का कतई एहसास नहीं रहा। हालांकि उनमें दरियादिली इस हद तक थी कि अपने दोस्त नरेंद्र बेदी को तोहफ़े में कार तक दे डाली थी।

'वो भी एक दौर था, ये भी एक दौर है...'

'आनंद' और 'बावर्ची' में दिग्गज फिल्मकार ऋषिकेश मुखर्जी को अपनी अदाकारी का मुरीद बना चुके काका जब 180 फिल्में देकर 40 साल बाद लाइफटाइम एचीवमेंट आईफा अवार्ड लेते हुए स्टेज पर अमिताभ बच्चन से मुख़ातिब होकर कहा था, 'वो भी एक दौर था, ये भी एक दौर है...' तो उनका हैरतअंगेज़ सफ़र हसीन ख़्वाब-सा लग रहा था। जबकि इस हकीक़त को काका ने शिद्दत से जीने में कोई कसर नहीं रख छोड़ी थी।

-गोविंद अग्रवाल

Govind Aggarwal
गोविंद अग्रवाल
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