

फिल्म गवर्नर में भारत के सबसे बड़े आर्थिक संकटों में से एक दौर को दिखाया गया है। आरबीआई गवर्नर द्वारा देश का सोना गिरवी रखने के फैसले को आप कैसे देखते हैं?
मनोज वाजपेयी : यह सिर्फ एक साहसिक नहीं, बल्कि बेहद हिम्मत वाला फैसला था। उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा था। जब किसी परिवार पर संकट आता है और उसके सारे संसाधन खत्म होने लगते हैं, तो वह अपनी बचत का सहारा लेता है। उन्होंने भी इसी सोच को देश पर लागू किया। कोई भी व्यक्ति या परिवार अपने गहने या सोना गिरवी नहीं रखना चाहता, लेकिन मुश्किल समय में ऐसे फैसले लेने पड़ते हैं। उस दौर में नेताओं और सरकार को इस फैसले के लिए राज़ी करना भी आसान नहीं था। लेकिन इसी निर्णय ने भारत को आर्थिक संकट से बाहर निकलने का रास्ता दिखाया।
आपने किरदार की भाषा और बॉडी लैंग्वेज पर कितना काम किया ?
मनोज वाजपेयी : बहुत ज़्यादा। यह एक पढ़े-लिखे, समझदार और जिम्मेदार अधिकारी का किरदार है। हमें यह दिखाना था कि वह अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है, लेकिन साथ ही उसकी शिक्षा और व्यक्तित्व भी साफ दिखाई दे। बॉडी लैंग्वेज किसी इंसान की मानसिक स्थिति को दर्शाती है। इसलिए हमने हर छोटी-बड़ी चीज़ पर काम किया ताकि किरदार पूरी तरह वास्तविक लगे।
इस भूमिका के लिए आपने कैसी तैयारी की ?
मनोज वाजपेयी : मैं अर्थशास्त्र का छात्र नहीं रहा हूँ। मैंने हिस्ट्री ऑनर्स किया है। इसलिए मुझे सबसे पहले अर्थव्यवस्था की बुनियादी बातें समझनी पड़ीं। जीडीपी क्या है, फिस्कल डेफिसिट क्या होता है, बैलेंस ऑफ पेमेंट्स क्या होता है-इन सब पर पढ़ाई की। वीडियो देखे, लेख पढ़े और लगातार रिसर्च की। किसी किरदार को तैयार करना एक लंबी प्रक्रिया होती है, जो धीरे-धीरे विकसित होती है।
क्या इस तरह का किरदार निभाते समय जिम्मेदारी का दबाव महसूस होता है?
मनोज वाजपेयी : मेरे लिए सबसे बड़ा दबाव हमेशा प्रदर्शन का होता है। मैं चाहता हूँ कि हर किरदार ईमानदारी और सच्चाई के साथ पर्दे पर आए। मेरी कोशिश रहती है कि हर भूमिका पिछली भूमिका से अलग दिखाई दे।
दर्शक इस फिल्म से क्या लेकर जाएँ ?
मनोज वाजपेयी : भले ही दर्शक हर आर्थिक शब्दावली न समझें, लेकिन उन्हें यह जरूर समझ आए कि कुछ संस्थाएँ पर्दे के पीछे रहकर देश की अर्थव्यवस्था और लोगों की जिंदगी को प्रभावित करती हैं। यह फिल्म उस व्यक्ति की कहानी है जिसने कठिन समय में एक ऐसा फैसला लिया, जिसने देश की दिशा बदल दी।
निर्देशक चिन्मय मांडलेकर के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?
मनोज वाजपेयी : स्क्रिप्ट मुझे लगभग साढ़े चार साल पहले मिली थी और पहली बार पढ़ते ही पसंद आ गई थी। अर्थशास्त्र जैसे विषय पर होने के बावजूद इसकी कहानी बेहद रोचक थी। जब फिल्म आगे बढ़ी, तो मैंने चिन्मय का नाम सुझाया। उन्होंने गहरी रिसर्च की, स्क्रिप्ट को और बेहतर बनाया और फिल्म में कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए। शुरुआती फुटेज देखकर मुझे भरोसा हो गया था कि फिल्म सही हाथों में है।
एक अभिनेता-निर्देशक के साथ काम करने का क्या फायदा होता है?
मनोज वाजपेयी : बहुत बड़ा फायदा होता है। एक अभिनेता ही समझ सकता है कि कैमरे के सामने खड़ा कलाकार किन चुनौतियों और भावनात्मक संघर्षों से गुजर रहा है। चिन्मय एक अभिनेता होने के नाते उन मुश्किलों को समझते थे, इसलिए उनके साथ काम करना बेहद सहज रहा।
आपकी फिल्मों में अक्सर यथार्थवादी कहानियाँ देखने को मिलती हैं। इसकी वजह क्या है?
मनोज वाजपेयी : क्योंकि लोग सच्ची कहानियों से जुड़ते हैं। हमारे आसपास हर व्यक्ति की अपनी कहानी है। बस स्टॉप पर खड़ा आदमी, दुकान पर बैठा व्यक्ति या कोई सरकारी अधिकारी-हर किसी का जीवन अपने आप में एक किरदार है। मैं उन्हीं वास्तविक अनुभवों को पर्दे पर लाने की कोशिश करता हूँ।
वास्तविक जीवन के अधिकारियों और व्यक्तियों पर आधारित किरदारों की तैयारी कैसे करते हैं?
मनोज वाजपेयी : मैं लोगों को देखता हूँ, उनसे बातचीत करता हूँ और उनकी जिंदगी को समझने की कोशिश करता हूँ। मेरे कई दोस्त आईएएस, आईपीएस और अन्य सेवाओं में हैं। उनकी सोच, जिम्मेदारियाँ, पारिवारिक जीवन और संघर्षों को समझना किसी भी किरदार को गढ़ने में बहुत मदद करता है।
तीन दशक से अधिक लंबे करियर में क्या कभी पूरी तरह व्यावसायिक फिल्में करने का मन हुआ ?
मनोज वाजपेयी : ऑफर तो बहुत आए, लेकिन मुझे हमेशा ऐसे किरदार आकर्षित करते हैं जो पहले भारतीय सिनेमा में नहीं दिखे हों। हो सकता है भविष्य में मैं सिर्फ मनोरंजन और कमाई के लिए भी कोई फिल्म करूँ। अगर ऐसा हुआ तो मुझे उसमें कोई संकोच नहीं होगा। लेकिन अभी तक मेरे फैसले हमेशा किरदार और कहानी के आधार पर रहे हैं।
क्या आज भी पुरस्कार आपके लिए उतने ही मायने रखते हैं ?
मनोज वाजपेयी : पुरस्कार सम्मान जरूर देते हैं, लेकिन सेट पर जाकर अभिनय नहीं कर सकते। जब आप कैमरे के सामने खड़े होते हैं, तब आपकी तैयारी और प्रतिभा ही काम आती है। हर नए किरदार की चुनौती किसी भी पुरस्कार से बड़ी होती है।
ऐसी कौन-सी बात है जो आप चाहते हैं कि लोग कलाकारों से पूछना बंद कर दें?
मनोज वाजपेयी : बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों के बारे में जरूरत से ज्यादा बात करना। किसी फिल्म की कमाई उसकी गुणवत्ता का पैमाना नहीं होती। सिनेमा की चर्चा उसके विषय, अभिनय और प्रभाव के आधार पर होनी चाहिए, सिर्फ कमाई के आधार पर नहीं। -लिपिका वर्मा