मुझे लगता है कि सिर्फ सिनेमा नहीं, पूरा समाज बदल रहा है : मधु

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Madhoo
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मधु इन दिनों अपने पेशेवर और निजी जीवन के बेहतरीन दौर का आनंद ले रही हैं। गवर्नर की रिलीज के बाद मधु की पैन इंडिया फिल्म चिन्ना चिन्ना आसाई रिलीज होने जा रही हैं । इसके अलावा अनिल कपूर के साथ उनकी आगामी ओटीटी सीरीज़ भी बॉलीवुड और टॉलीवुड दोनों इंडस्ट्री में चर्चा का विषय बनी हुई है। इस खास मुलाकात में उन्होंने अपने सफर, निजी और पेशेवर जीवन, फिल्मों के साथ अन्य कई दिलचस्प पहलुओं पर खुलकर बातचीत की।

एक समय ऐसा भी था जब मैंने रिसेप्शनिस्ट, स्टेनोग्राफर और एयर होस्टेस बनने की कोशिश की, लेकिन कुछ भी सफल नहीं हुआ। आज पीछे मुड़कर देखती हूं तो लगता है कि हर चीज़ किसी कारण से हुई, क्योंकि अंततः मैं वहीं पहुंची जहां मेरा असली स्थान था।

पीछे मुड़कर देखने पर आप फिल्म इंडस्ट्री में अपनी यात्रा को किस तरह देखती हैं?

मुझे सचमुच लगता है कि मैं इसी दुनिया के लिए बनी थी। बहुत छोटी उम्र से ही मैं अभिनेत्री बनना चाहती थी। हेमा मालिनी जी से रिश्तेदारी होने के कारण मैं अक्सर फिल्म सेट्स पर जाती थी और उन्हें डांस की रिहर्सल करते तथा काम करते देखती थी। मेरी मां भी प्रशिक्षित नृत्यांगना थीं और बाद में डांस टीचर बन गईं, इसलिए हमारे घर का माहौल हमेशा संगीत और नृत्य से भरा रहता था। दिलचस्प बात यह है कि मेरे पास अभिनेत्री बनने की कोई ठोस योजना नहीं थी। मैं बस किसी तरह इस इंडस्ट्री में आ गई। उससे पहले मुझे कई असफलताओं और अनिश्चितताओं का सामना करना पड़ा। एक समय ऐसा भी था जब मैंने रिसेप्शनिस्ट, स्टेनोग्राफर और एयर होस्टेस बनने की कोशिश की, लेकिन कुछ भी सफल नहीं हुआ। आज पीछे मुड़कर देखती हूं तो लगता है कि हर चीज़ किसी कारण से हुई, क्योंकि अंततः मैं वहीं पहुंची जहां मेरा असली स्थान था।

मैं अपने बच्चों की जिंदगी के हर छोटे-बड़े पल को जीना चाहती थी-उनका पहला कदम, पहला शब्द, पहला हेयरकट, स्कूल का पहला दिन। मैंने हर चीज़ को संजोकर रखा। लगभग दस वर्षों तक मैंने खुद को पूरी तरह उनके पालन-पोषण के लिए समर्पित कर दिया। जब वे बड़े हुए और अधिक स्वतंत्र हो गए, तब मैं स्वाभाविक रूप से फिर अभिनय की ओर लौट आई।

शादी के बाद आपने कुछ समय के लिए फिल्मों से दूरी बना ली थी। इसके पीछे क्या कारण था ?

जब मेरे बच्चे पैदा हुए, तो वही मेरी पूरी दुनिया बन गए । मैं उन महिलाओं का बहुत सम्मान करती हूं जो मातृत्व और अपने करियर को सफलतापूर्वक साथ लेकर चलती हैं, लेकिन मुझे कभी नहीं पता था कि ऐसा संतुलन कैसे बनाया जाए। मैं अपने बच्चों की जिंदगी के हर छोटे-बड़े पल को जीना चाहती थी-उनका पहला कदम, पहला शब्द, पहला हेयरकट, स्कूल का पहला दिन। मैंने हर चीज़ को संजोकर रखा। लगभग दस वर्षों तक मैंने खुद को पूरी तरह उनके पालन-पोषण के लिए समर्पित कर दिया। जब वे बड़े हुए और अधिक स्वतंत्र हो गए, तब मैं स्वाभाविक रूप से फिर अभिनय की ओर लौट आई। मैं शायद एक साथ कई काम करने में बहुत अच्छी नहीं हूं, लेकिन जो भी करती हूं, पूरे दिल और आत्मा से करती हूं।

अच्छे सह-कलाकार स्वस्थ प्रतिस्पर्धा पैदा करते हैं और अंततः इसका फायदा प्रदर्शन को ही मिलता है।

फिल्म 'गवर्नर' में आप मनोज बाजपेयी के साथ नजर आयी हैं । यह अनुभव कैसा रहा?

बेहतरीन कलाकारों के साथ काम करना हमेशा आपको और बेहतर बनने के लिए प्रेरित करता है। जब आप मनोज बाजपेयी जैसे प्रतिभाशाली अभिनेता के साथ अभिनय कर रहे होते हैं, तो आप अपने मानकों को खुद ही ऊंचा कर लेते हैं। मैंने अपने पूरे करियर में यह अनुभव किया है। चाहे प्रभु देवा के साथ डांस करना हो या गोविंदा के साथ अभिनय करना, उनकी उत्कृष्टता ने मुझे हमेशा और मेहनत करने के लिए प्रेरित किया। अच्छे सह-कलाकार स्वस्थ प्रतिस्पर्धा पैदा करते हैं और अंततः इसका फायदा प्रदर्शन को ही मिलता है।

'मिस्टर रोमियो' का एक किस्सा आज भी मुझे याद है। हम एक गाने की रिहर्सल कर रहे थे और मुझे अभ्यास करते देखने के बाद प्रभु देवा ने अपने असिस्टेंट्स से कहा कि वे मेरे साथ रिहर्सल जारी रखें, जबकि वह खुद वहां से चले गए। उस पल मुझे थोड़ा अपमानित महसूस हुआ क्योंकि मैं खुद को एक अच्छी डांसर मानती थी। लेकिन वही भावना मेरे लिए प्रेरणा बन गई। मैंने लगातार अभ्यास किया, जब तक कि मुझे पूरी तरह तैयार महसूस नहीं हुआ। जब वह गाना रिलीज़ हुआ, तो लोगों ने सराहना की

प्रभु देवा के साथ काम करने की कोई यादगार कहानी ?

'मिस्टर रोमियो' का एक किस्सा आज भी मुझे याद है। हम एक गाने की रिहर्सल कर रहे थे और मुझे अभ्यास करते देखने के बाद प्रभु देवा ने अपने असिस्टेंट्स से कहा कि वे मेरे साथ रिहर्सल जारी रखें, जबकि वह खुद वहां से चले गए। उस पल मुझे थोड़ा अपमानित महसूस हुआ क्योंकि मैं खुद को एक अच्छी डांसर मानती थी। लेकिन वही भावना मेरे लिए प्रेरणा बन गई। मैंने लगातार अभ्यास किया, जब तक कि मुझे पूरी तरह तैयार महसूस नहीं हुआ। जब वह गाना रिलीज़ हुआ, तो लोगों ने सराहना की कि मैंने उनके साथ कदम से कदम मिलाकर डांस किया। आज मैं उस घटना को कृतज्ञता के साथ याद करती हूं क्योंकि उन्होंने मुझे बेहतर होने के लिए समय दिया, बजाय इसके कि शूटिंग जल्दी-जल्दी पूरी कर ली जाती।

गोविंदा के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा ?

मुझे गोविंदा के साथ काम करना बेहद पसंद था। उनकी कॉमिक टाइमिंग असाधारण है। वे पूरे सेट का माहौल खुशनुमा बनाए रखते थे और हर सीन को मजेदार बना देते थे। हथकड़ी जैसी फिल्मों में मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा। जब आप किसी ऐसे कलाकार के साथ काम करते हैं जिसकी कॉमेडी पर पकड़ बहुत मजबूत हो, तो आपकी अपनी टाइमिंग भी निखरती है। मेरी कुछ सबसे खूबसूरत यादें उन्हीं कॉमेडी दृश्यों से जुड़ी हैं।

असल जिंदगी में मैं बहुत खुशमिजाज हूं और लोगों को हंसाना पसंद करती हूं, लेकिन दर्शकों ने रोजा, यशवंत और फूल और कांटे जैसी फिल्मों में मेरे भावनात्मक अभिनय से सबसे ज्यादा जुड़ाव महसूस किया

कॉमेडी पसंद करने के बावजूद दर्शक आपको भावनात्मक भूमिकाओं के लिए ज्यादा याद करते हैं। ऐसा क्यों?

यह काफी दिलचस्प है क्योंकि असल जिंदगी में मैं बहुत खुशमिजाज हूं और लोगों को हंसाना पसंद करती हूं, लेकिन दर्शकों ने रोजा, यशवंत और फूल और कांटे जैसी फिल्मों में मेरे भावनात्मक अभिनय से सबसे ज्यादा जुड़ाव महसूस किया। मेरी पहली फिल्म में भी गहरे भावनात्मक दृश्य थे। शायद करियर की शुरुआत से ही लोगों को लगा कि मैं भावनात्मक दृश्यों को अच्छी तरह निभा सकती हूं, और वही मेरी स्क्रीन पहचान का बड़ा हिस्सा बन गया।

अजय देवगन और गोविंदा जैसे कलाकारों के साथ काम करने का अनुभव कैसा था?

अजय बिल्कुल वैसे ही थे जैसे लोग उनके बारे में कहते हैं-शांत और संकोची। वे ज्यादा बात नहीं करते थे, लेकिन उनका हास्यबोध शानदार था । वे बेहद गंभीर चेहरा बनाए रखते हुए धीरे से कोई मजाक कर देते और आसपास मौजूद सभी लोग हंस पड़ते । वहीं गोविंदा, मेरे अनुभव में, बिल्कुल भी फ्लर्ट करने वाले नहीं थे। मुझे उनकी जो बात सबसे ज्यादा याद है, वह है उनकी अद्भुत कॉमिक टाइमिंग, सहजता और बेहतरीन डांसिंग स्किल्स। उनके साथ काम करना हमेशा मजेदार और रचनात्मक रूप से संतोषजनक रहा।

लेकिन वह बेहद दृढ़ थीं। वह बार-बार कहती रहीं कि उन्होंने यह किरदार खास तौर पर मुझे ध्यान में रखकर लिखा है और किसी और को इस भूमिका में सोच भी नहीं सकतीं। आखिरकार मैंने हां कह दी।

अपनी तमिल फिल्म 'चिन्ना चिन्ना आसाई' के बारे में बताइए?

इस फिल्म का शीर्षक रोजा के प्रतिष्ठित गीत से लिया गया है। जब निर्देशक वर्षा वासुदेवन मेरे पास इसकी स्क्रिप्ट लेकर आईं, तो मैंने शुरुआत में मना कर दिया क्योंकि उन्हें दिसंबर में पूरे एक महीने वाराणसी में शूटिंग करनी थी, और उस समय मेरे बच्चे क्रिसमस की छुट्टियों में घर पर रहते, लेकिन वह बेहद दृढ़ थीं। वह बार-बार कहती रहीं कि उन्होंने यह किरदार खास तौर पर मुझे ध्यान में रखकर लिखा है और किसी और को इस भूमिका में सोच भी नहीं सकतीं। आखिरकार मैंने हां कह दी। आज मैं बहुत खुश हूं कि मैंने यह फैसला लिया। यह उन परियोजनाओं में से एक है जिन पर मुझे सबसे ज्यादा गर्व है।

चिन्ना चिन्ना आसाई आपके लिए इतनी खास क्यों है ?

आज की इंडस्ट्री में फैसले अक्सर बॉक्स ऑफिस और व्यावसायिक गणनाओं के आधार पर लिए जाते हैं। ऐसे समय में किसी फिल्मकार का मेरे इर्दगिर्द पूरी थिएट्रिकल फिल्म बनाना मेरे लिए बेहद खास था । यह महिला प्रधान कहानी है, लेकिन इसमें एक शानदार पुरुष किरदार भी है, जिसे इंद्रंस सर ने निभाया है। वह एक असाधारण अभिनेता और कई राष्ट्रीय पुरस्कारों के विजेता हैं। जब मैंने उनके काम के बारे में और जाना, तो मैं उनकी प्रतिभा से बेहद प्रभावित हुई। यह फिल्म मेरे दिल के बहुत करीब है क्योंकि इसका अस्तित्व केवल एक निर्देशक के अपनी कहानी पर विश्वास और इस भरोसे की वजह से है कि मैं इसे सही तरीके से पर्दे पर ला सकती हूं।

यह ऐसी बात है जिसे मैं हमेशा संजोकर रखूंगी

फिल्म को लेकर दर्शकों की उत्सुकता और प्रतिक्रिया के बारे में क्या कहना चाहेंगी ?

मैं बेहद आभारी हूं। एक युवा फिल्मकार का मुझ पर इतना भरोसा करना कि वह पूरी कहानी मेरे इर्दगिर्द रचे, यह ऐसी बात है जिसे मैं हमेशा संजोकर रखूंगी। कई बार सबसे अच्छे अवसर वही होते हैं जिन्हें हम शुरुआत में ठुकरा देते हैं। सौभाग्य से मैंने इस बार हां कहा और आज मुझे इस खूबसूरत फिल्म का हिस्सा होने पर गर्व है ।

हमारी इंडस्ट्री में रोमांस को अक्सर युवा कपल्स से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि अब बदलाव आ रहा है, लेकिन फिर भी किसी थिएट्रिकल फिल्म का एक उम्रदराज़ कपल की भावनात्मक यात्रा पर केंद्रित होना दुर्लभ है।

चिन्ना चिन्ना आसाई को आम रोमांटिक फिल्मों से अलग क्या बनाता है?

इस फिल्म की सबसे अनोखी बात यह है कि यह परिपक्व उम्र के लोगों के बीच पनपने वाले प्रेम को दिखाती है। हमारी इंडस्ट्री में रोमांस को अक्सर युवा कपल्स से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि अब बदलाव आ रहा है, लेकिन फिर भी किसी थिएट्रिकल फिल्म का एक उम्रदराज़ कपल की भावनात्मक यात्रा पर केंद्रित होना दुर्लभ है। इस फिल्म में मैं इंद्रंस सर के साथ हूं, जो साठ वर्ष की उम्र में हैं, और हम दोनों एक बेहद संवेदनशील और दिल को छू लेने वाली प्रेम कहानी को जीते हैं। यह बड़े-बड़े गीतों और नृत्यों वाली प्रेम कहानी नहीं है। यह भावनात्मक जुड़ाव, साथ और इंसानी रिश्तों की कहानी है। कहानी एक तमिल भाषी महिला और एक मलयालम भाषी पुरुष की है, जो काशी में मिलते हैं, जहां आसपास के लोग हिंदी बोलते हैं। दोनों एक-दूसरे की भाषा पूरी तरह नहीं समझते, फिर भी उनके बीच एक रिश्ता बनता है। इसी मायने में यह सच्चा पैन-इंडियन सिनेमा है-डबिंग की वजह से नहीं, बल्कि अलग-अलग संस्कृतियों और लोगों के वास्तविक मिलन की वजह से।

मुझे लगता है कि सिर्फ सिनेमा नहीं, पूरा समाज बदल रहा है। जैसे-जैसे महिलाओं की स्थिति मजबूत हो रही है, वैसे-वैसे दर्शक भी स्क्रीन पर उनकी प्रस्तुति को लेकर सवाल पूछ रहे हैं। ये चर्चाएं जरूरी हैं क्योंकि ये फिल्मकारों को अधिक संवेदनशील और जागरूक बनाती हैं।

हाल के दिनों में फिल्मों में महिलाओं की प्रस्तुति, विशेषकर कुछ गीतों और कैमरा एंगल्स को लेकर काफी बहस हुई है। आपका नजरिया क्या है ?

जो चीज़ें आज विवादास्पद मानी जाती हैं, जरूरी नहीं कि 1990 के दशक में भी वैसी ही मानी जाती थीं। उस समय कुछ डांस मूव्स, कैमरा एंगल्स और दृश्य शैली मुख्यधारा के मनोरंजन का हिस्सा माने जाते थे। दर्शक उन्हें पसंद करते थे और फिल्मकार वही बनाते थे जो उन्हें लगता था कि लोग देखना चाहते हैं, लेकिन समाज बदल चुका है। लैंगिक समानता, प्रतिनिधित्व और वस्तुकरण जैसे मुद्दों पर चर्चा कहीं अधिक खुलकर होने लगी है। महिलाओं की आवाज़ पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हुई है और वे उन बातों पर सवाल उठा रही हैं जिन पर पहले खुलकर चर्चा नहीं होती थी। मुझे लगता है कि सिर्फ सिनेमा नहीं, पूरा समाज बदल रहा है। जैसे-जैसे महिलाओं की स्थिति मजबूत हो रही है, वैसे-वैसे दर्शक भी स्क्रीन पर उनकी प्रस्तुति को लेकर सवाल पूछ रहे हैं। ये चर्चाएं जरूरी हैं क्योंकि ये फिल्मकारों को अधिक संवेदनशील और जागरूक बनाती हैं।

महिलाओं के सशक्त होने के साथ-साथ वे बातें भी सामने आ रही हैं जिन्हें पहले नजरअंदाज कर दिया जाता था। यह बदलाव सिर्फ सिनेमा में नहीं, पूरे समाज में दिखाई दे रहा है।

क्या महिलाओं की इस बढ़ती आवाज़ ने फिल्म इंडस्ट्री को भी बदला है ?

बिल्कुल। समान वेतन, बराबर अवसर और प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर पहले शायद ही कभी खुलकर चर्चा होती थी, जबकि कई बार सफल फिल्मों की पूरी जिम्मेदारी महिला सितारों ने अपने कंधों पर उठाई होती थी। आज महिलाएं इन असमानताओं पर सवाल उठा रही हैं और निष्पक्ष व्यवहार की मांग कर रही हैं। महिलाओं के सशक्त होने के साथ-साथ वे बातें भी सामने आ रही हैं जिन्हें पहले नजरअंदाज कर दिया जाता था। यह बदलाव सिर्फ सिनेमा में नहीं, पूरे समाज में दिखाई दे रहा है।

आपने बताया कि 'गवर्नर' और 'चिन्ना चिन्ना आसाई' दोनों ही फिल्में आपने शुरुआत में ठुकरा दी थीं। गवर्नर को लेकर हिचकिचाहट क्यों थी ?

सबसे पहले मुझे शूटिंग के दिनों की संख्या सुनकर संदेह हुआ। मुझे बताया गया कि मेरे हिस्से की शूटिंग सिर्फ पांच दिन की है, तो मैंने सोचा कि किरदार कितना महत्वपूर्ण हो सकता है । शुरुआत में मुझे लगा कि शायद यह भूमिका करने लायक नहीं है, लेकिन फिर निर्माता मुकेश जी ने मुझे व्यक्तिगत रूप से फोन किया और समझाया कि कहानी में इस किरदार की भूमिका कितनी अहम है। उन्होंने कहा कि भले ही स्क्रीन टाइम कम हो, लेकिन चरित्र का प्रभाव पूरी कहानी पर पड़ता है। जब मैंने उसकी भावनात्मक और विषयगत अहमियत को समझा, तो मैंने अपना फैसला बदल दिया। -लिपिका वर्मा

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