

'इक्का' को एक दमदार कोर्टरूम ड्रामा के रूप में काफी सराहना मिली है और कम स्क्रीन टाइम के बावजूद आपकी परफॉर्मेंस ने गहरी छाप छोड़ी। आपको इस फिल्म के लिए हां कहने की वजह क्या थी ?
जब निर्देशक सिद्धार्थ ने मुझे स्क्रिप्ट सुनाई, तो उन्होंने पूरी ईमानदारी से बताया कि तकनीकी रूप से मेरे हिस्से में सिर्फ कुछ ही सीन हैं और उनमें से कुछ एडिटिंग के दौरान हट भी सकते हैं। लेकिन उन्होंने एक बात कही जो मेरे दिल को छू गई । उन्होंने कहा कि फिल्म में मेरी मौजूदगी को कोई नज़रअंदाज़ नहीं कर पाएगा ।
उन्होंने समझाया कि दर्शकों का पीड़िता से भावनात्मक जुड़ाव सीधे नहीं होगा, बल्कि उसकी मां के ज़रिए होगा। सहानुभूति, दर्द और संवेदना-ये सारी भावनाएं मेरे किरदार के माध्यम से दर्शकों तक पहुंचेंगी। उन्हें विश्वास था कि मैं बेहद संयमित तरीके से गहरी भावनाओं को निभा सकती हूं। उनका यही भरोसा मुझे इस किरदार से तुरंत जोड़ गया।
उन्हें विश्वास था कि मैं बेहद संयमित तरीके से गहरी भावनाओं को निभा सकती हूं। उनका यही भरोसा मुझे इस किरदार से तुरंत जोड़ गया।
कोर्टरूम के दृश्यों में आपका अभिनय बेहद संयमित और भावनात्मक था। आपने इसकी तैयारी कैसे की ?
मैंने अभिनय की कोई औपचारिक ट्रेनिंग नहीं ली है, लेकिन मेरा मानना है कि एक अभिनेता जीवनभर विद्यार्थी रहता है। हर दिन कुछ नया सीखने का मौका मिलता है। ऐसे किरदार के लिए मैं अपनी निजी यादों का सहारा नहीं लेती। मैं पूरी तरह उस किरदार की दुनिया में खो जाती हूं। मेरी बेटी पर क्रूर हमला हुआ है, वह जिंदगी और मौत से लड़ रही है, और मैं अदालत में उस इंसान को देख रही हूं जिसने यह सब किया। मैं खुद से पूछती हूं कि उस पल एक मां वास्तव में क्या महसूस करेगी। हर भावना अलग होती है। असल जिंदगी में हम हर बार एक जैसे नहीं रोते, तो अभिनेता को भी हर बार एक जैसा क्यों रोना चाहिए? कभी दुख ज़ोर से बाहर आता है, कभी खामोशी में, तो कभी पूरी तरह नियंत्रित रहता है। मैं अपनी भावनाओं के बजाय किरदार की सच्चाई पर ध्यान देती हूं।
आपकी भावनाएं बेहद वास्तविक लगीं। क्या आप जानबूझकर अपने निजी जीवन को ऐसे दृश्यों से अलग रखती हैं ?
बिल्कुल,अगर मैं किसी भावुक दृश्य में अपनी बेटी के बारे में सोचने लगूं, तो मैं ज्योति की तरह प्रतिक्रिया दूंगी, किरदार की तरह नहीं। मेरी जिम्मेदारी उस महिला को पूरी तरह जीने की है । मैं अपने मन में उस महिला की पूरी कहानी बना लेती हूं। वह अकेले अपनी बेटी की परवरिश करती है, उसका कोई पति नहीं है, बेटी सीए की पढ़ाई कर रही थी और अचानक उसकी पूरी दुनिया बिखर जाती है। जब मैं मानसिक रूप से उसकी जिंदगी जीने लगती हूं, तो भावनाएं अपने आप आ जाती हैं ।
आपकी परफॉर्मेंस को काफी सराहना मिली। क्या आपने इतनी सकारात्मक प्रतिक्रिया की उम्मीद की थी ?
सच कहूं तो बिल्कुल नहीं। मैंने यह भूमिका इसलिए स्वीकार की क्योंकि मुझे यह किरदार बेहद पसंद आया था। लेकिन मैंने कभी नहीं सोचा था कि दर्शक इसे इतना प्यार देंगे। यह सराहना मेरे लिए बेहद सुखद और खूबसूरत सरप्राइज रही है। मैं सिद्धार्थ और सपना की बहुत आभारी हूं कि उन्होंने मुझ पर भरोसा किया और मुझे यह अवसर दिया।
क्या 'इक्का' के बाद आपको नए प्रोजेक्ट्स के ऑफर मिलने शुरू हो गए हैं ?
जी हां, शुक्र है कि मुझे कई ऑफर मिले हैं।फिलहाल बातचीत चल रही है, इसलिए अभी आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं बता सकती। उम्मीद है कि बहुत जल्द मैं अपने अगले प्रोजेक्ट की घोषणा करूंगी और उसके बारे में विस्तार से बात कर पाऊंगी।
फिल्मों और ओटीटी के बढ़ते दौर में भी आपने टेलीविजन से जुड़ाव बनाए रखा है। इसकी क्या वजह है ?
क्योंकि मेरी शुरुआत टेलीविजन से हुई थी। कई कास्टिंग डायरेक्टर्स ने मुझे सलाह दी कि अगर मुझे फिल्मों और ओटीटी पर ध्यान देना है, तो टीवी छोड़ देना चाहिए। उनका मानना है कि टीवी कलाकार अक्सर माध्यम की वजह से ज़्यादा नाटकीय हो जाते हैं। मैं उनकी बात समझती हूं, लेकिन मुझे टेलीविजन से सच्चा लगाव है। इसी ने मुझे पहचान दी है और मैं अपनी जड़ों को कभी नहीं भूल सकती। मुझे रोज़ काम करने की नियमितता भी बहुत पसंद है।
टेलीविजन में टीआरपी के हिसाब से कहानियां बदलती रहती हैं। क्या यह आपको परेशान करता है ?
बिल्कुल करता है। कई बार आपका किरदार अचानक सकारात्मक से नकारात्मक हो जाता है या पूरी तरह बदल जाता है। शुरुआत में मुझे गुस्सा आता है क्योंकि ऐसा लगता है कि किरदार की सच्चाई खो गई है लेकिन बाद में मैं इसे एक चुनौती की तरह देखती हूं। हर बदलाव मुझे अभिनेत्री के रूप में कुछ नया तलाशने का मौका देता है। विरोध करने के बजाय मैं उससे सीखने की कोशिश करती हूं।
आपने कहा कि आप लगातार सीखती रहती हैं। अपने अभिनय को बेहतर बनाने के लिए क्या करती हैं ?
शायद मैं खुद की सबसे बड़ी आलोचक हूं, जहां कई कलाकार अपनी परफॉर्मेंस देखना पसंद नहीं करते, वहीं मैं हर एपिसोड और हर सीन देखती हूं और खुद का ईमानदारी से विश्लेषण करती हूं। मैं खुद से पूछती हूं, "क्या मैं अलग तरह से प्रतिक्रिया दे सकती थी?" या "मैंने आंखों में देखकर बात करने के बजाय नीचे क्यों देखा?" मैं अपने परिवार से भी फीडबैक लेती हूं। सीखने की प्रक्रिया कभी खत्म नहीं होती और आत्मविश्लेषण मुझे अपनी गलतियां दोहराने से बचाता है।
टेलीविजन और फिल्मों में अभिनय करने का सबसे बड़ा अंतर आपने क्या महसूस किया ?
फिल्मों ने मुझे सबसे बड़ा सबक यह सिखाया कि खामोशी भी शब्दों से कहीं ज़्यादा असरदार हो सकती है। टेलीविजन में अक्सर लंबे संवाद और मोनोलॉग के ज़रिए भावनाएं व्यक्त की जाती हैं। लेकिन 'इक्का' में मैंने महसूस किया कि बिना एक शब्द बोले भी आप दर्द, गुस्सा, असुरक्षा, चिंता और ताकत सब कुछ व्यक्त कर सकते हैं। कई बार आपकी आंखें ही सब कुछ कह देती हैं। यही बारीकी सिनेमा की मांग है और इसे सीखना मुझे बेहद पसंद आया।
'इक्का' एक युवा लड़की के साथ हुए जघन्य अपराध की कहानी है। एक मां होने के नाते समाज में ऐसी घटनाओं को आप कैसे देखती हैं ?
यह बेहद दुखद है। एक नागरिक, एक मां और एक इंसान होने के नाते ऐसी हर घटना मुझे भीतर तक झकझोर देती है। हम सिर्फ यही उम्मीद और प्रार्थना कर सकते हैं कि पीड़ितों को जल्द से जल्द न्याय मिले। मेरा मानना है कि हमारी न्याय व्यवस्था और तेज़ होनी चाहिए, ताकि पीड़ित और उनके परिवारों को न्याय के लिए लंबा इंतजार न करना पड़े। हर मामला अलग होता है, लेकिन हर किसी को न्याय मिलना चाहिए।
भविष्य में आप किस तरह के किरदार निभाना चाहेंगी?
मैं हर तरह के किरदार निभाना चाहती हूं। बेशक, एक दिन मैं किसी फिल्म की मुख्य अभिनेत्री बनना चाहूंगी, लेकिन इसके साथ-साथ मैं ग्रे और नेगेटिव किरदार निभाने के लिए भी उतनी ही उत्साहित हूं। एक अभिनेता को सिर्फ मासूम मां या बेबस महिला जैसे किरदारों तक सीमित नहीं होना चाहिए। मैं मजबूत, सख्त और नैतिक रूप से जटिल किरदार निभाना चाहती हूं। इंसानी स्वभाव के अलग-अलग रंगों को निभाना ही मुझे सबसे ज़्यादा आकर्षित करता है।
क्या अब भी आपके लिए स्क्रीन टाइम मायने रखता है ?
इस फिल्म ने साबित कर दिया कि एक प्रभावशाली दृश्य भी दर्शकों के दिल में हमेशा के लिए जगह बना सकता है। मेरे लिए स्क्रीन टाइम से ज़्यादा स्क्रीन प्रेजेंस मायने रखती है। अगर मेरा किरदार कहानी के लिए महत्वपूर्ण है और उसका उद्देश्य सार्थक है, तो उसकी लंबाई मेरे लिए कोई मायने नहीं रखती ।
आखिर में आप अपने दर्शकों से क्या कहना चाहेंगी ?
मैं दिल की गहराइयों से सभी का धन्यवाद करना चाहती हूं। 'इक्का' के लिए मुझे जो प्यार, सराहना, संदेश और समर्थन मिला है, वह मेरे लिए बेहद भावुक कर देने वाला है। हम कलाकार इसलिए हैं क्योंकि दर्शक हमें अपनाते हैं और हमारा हौसला बढ़ाते हैं। आपके प्यार के बिना हमारे काम का कोई अर्थ नहीं है। कृपया आगे भी हमारा काम देखते रहें, अपना प्यार और आशीर्वाद देते रहें। यह मेरे लिए दुनिया की सबसे बड़ी खुशी है। -लिपिका वर्मा