

नई दिल्ली : भारत को अन्य विकासशील देशों की तरह वैश्विक पूंजी आकर्षित करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिका के साथ व्यापार संबंधों को लेकर अनिश्चितता, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और वैश्विक स्तर पर कृत्रिम मेधा (एआई) से जुड़े घटनाक्रमों में भारत के लिए निवेश के अवसर सीमित होने से देश की निवेश आकर्षित करने की क्षमता प्रभावित हो रही है। वित्त मंत्रालय की सितंबर की मासिक आर्थिक समीक्षा में यह बात कही गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई-अगस्त के जीएसटी संग्रह और निर्यात सहित कुछ उच्च आवृत्ति वाले आर्थिक संकेतक अप्रैल-जून तिमाही में 7.8 प्रतिशत की मजबूत जीडीपी वृद्धि के बाद आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार में कुछ नरमी का संकेत दे रहे हैं। मंत्रालय ने कहा कि वैश्विक परिस्थितियां फिर प्रतिकूल हुई हैं और सितंबर में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के साथ रुपये पर भी निकट अवधि में दबाव बना हुआ है।
समीक्षा में कहा गया कि भारत कोविड के बाद की वृद्धि की उपलब्धियों पर निर्भर नहीं रह सकता और उसे हर तिमाही अपनी आर्थिक मजबूती साबित करनी होगी। रिपोर्ट ने अर्थव्यवस्था को केवल ‘कारोबार के अनुकूल’ बनाने के बजाय अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने पर जोर दिया है। मंत्रालय के अनुसार, प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था ही सफल, नवोन्मेषी और विनिर्माण आधारित अर्थव्यवस्था बन सकती है।
रिपोर्ट में कहा गया कि अमेरिका के साथ अस्थिर व्यापार संबंध, शुल्क संबंधी दबाव, कच्चे तेल की कीमतों और आपूर्ति में अनिश्चितता तथा एआई के कारण वैश्विक पूंजी प्रवाह में बदलाव ने विकासशील देशों के सामने चुनौती बढ़ाई है। हालांकि, शुद्ध आधार पर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश इस वित्त वर्ष में पिछले साल से बेहतर रह सकता है।
मंत्रालय ने कहा कि चुनौतीपूर्ण वैश्विक माहौल में भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती देश की बड़ी ताकत है। निवेशकों की दिलचस्पी बनी हुई है, लेकिन वे फिलहाल सतर्क हैं।
रिपोर्ट ने वैश्विक ध्रुवीकरण, आपूर्ति शृंखला के रणनीतिक इस्तेमाल और ऊर्जा, धातु, इलेक्ट्रॉनिक्स, खाद्य तथा सेमीकंडक्टर क्षेत्रों में संभावित आपूर्ति झटकों को भी जोखिम बताया। विकसित देशों में ऊंची ब्याज दरों से सीमापार पूंजी प्रवाह पर दबाव बढ़ने की आशंका है। ऐसे में स्थिर नीतियां, गुणवत्तापूर्ण फैसले और तेज निर्णय प्रक्रिया निवेशकों का भरोसा मजबूत करने में अहम होंगी।