रुपये को और गिरने दे RBI : पूर्व गवर्नर सुब्बाराव

महंगाई का जोखिम बढ़ने पर ब्याज दर बढ़ाने के बजाय तरलता प्रबंधन को प्राथमिकता देनी चाहिए
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रुपया में गिरावट चिंता का सबब बना हुआ ( फाइल फोटो )
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मुंबई : भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव ने कहा है कि बाहरी दबावों को झेलने के लिए केंद्रीय बैंक को रुपये में कुछ और गिरावट आने देनी चाहिए और महंगाई का जोखिम बढ़ने पर ब्याज दर बढ़ाने के बजाय तरलता प्रबंधन जैसे उपायों को प्राथमिकता देनी चाहिए। सुब्बाराव ने कहा कि विनिमय दर को संभालने के लिए मौद्रिक नीति का सहारा केवल ‘अंतिम उपाय’ के तौर पर लिया जाना चाहिए। वर्ष 2008 से लेकर 2013 तक आरबीआई के गवर्नर रह चुके सुब्बाराव ने कहा, रुपये के स्तर को बचाने के बजाय उसे परिस्थितियों के अनुरूप समायोजित होने देना चाहिए, क्योंकि कमजोर रुपया बाहरी झटकों को झेलने में मदद करता है। यदि RBI को ऐसा लगता है कि महंगाई की स्थिति इसकी मांग करती है, तो वह मौद्रिक नीति को सख्त कर सकता है।

क्या है स्थिति : भू-राजनीतिक अनिश्चितता और पश्चिम एशिया संकट के कारण रुपया दबाव में है और इस महीने की शुरुआत में यह डॉलर के मुकाबले 97.15 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया। पश्चिम एशिया संकट की शुरुआत से रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अब तक करीब पांच प्रतिशत गिर चुका है जबकि इस वर्ष की शुरुआत से इसमें 6.1 प्रतिशत और एक साल के भीतर 10 प्रतिशत से अधिक गिरावट आई है।

संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण : सुब्बाराव ने कहा कि RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) के सामने संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि दरों में कटौती से महंगाई और विनिमय दर पर दबाव बढ़ सकता है, जबकि आक्रामक दर बढ़ोतरी से आर्थिक वृद्धि प्रभावित हो सकती है। मौजूदा स्थिति में दर बढ़ाने के बजाय इंतजार करना और महंगाई के रुझान का आकलन करना बेहतर होगा। यदि महंगाई में तेज बढ़ोतरी होती है, तो पहले तरलता या नकदी प्रबंधन के जरिये सख्ती की जा सकती है, न कि सीधे दर बढ़ाकर।

कब होगी बैठक : MPC की बैठक तीन से पांच जून के बीच प्रस्तावित है, जिसमें नीतिगत दर पर निर्णय लिया जाएगा। फिलहाल रेपो दर 5.25 प्रतिशत है और केंद्रीय बैंक पिछले वर्ष से अब तक इसमें 1.25 प्रतिशत की कटौती कर चुका है।

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