

नई दिल्ली : पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने पेट्रोलियम (संशोधन) विधेयक, 2026 का मसौदा जारी कर हितधारकों से सुझाव मांगे हैं। प्रस्तावित संशोधनों का उद्देश्य पेट्रोलियम उत्पादों के आयात, परिवहन, भंडारण, उत्पादन, रिफाइनिंग और मिश्रण से जुड़े छोटे नियामकीय उल्लंघनों को आपराधिक दायरे से बाहर करना है।
मंत्रालय के अनुसार, मौजूदा पेट्रोलियम अधिनियम, 1934 की धारा 23 में एक सामान्य अपराध प्रावधान है, जिसके तहत लाइसेंस की शर्तों के उल्लंघन को भी आपराधिक अपराध माना जा सकता है। प्रस्तावित बदलावों में ऐसे नियामकीय उल्लंघनों के लिए आपराधिक कार्रवाई के बजाय प्रशासनिक प्रक्रिया के माध्यम से नागरिक दंड लगाने की व्यवस्था की जाएगी।
मसौदे में अधिनियम के ‘दंड एवं प्रक्रिया’ से जुड़े अध्याय-III में व्यापक बदलाव प्रस्तावित हैं। इसके तहत धारा 23 और 25 को बदलने, नई धाराएं 23A, 23B, 23C, 23D और 23E जोड़ने तथा धारा 24 में संशोधन का प्रस्ताव है। साथ ही पेट्रोलियम क्षेत्र के विभिन्न संचालन से जुड़े विशिष्ट अपराधों के लिए अलग-अलग प्रावधान बनाए जाएंगे।
मंत्रालय ने कहा कि इसका उद्देश्य लाइसेंस की शर्तों के उल्लंघन जैसे नियामकीय मामलों को अपराध मानने से बचना है, लेकिन पेट्रोलियम संचालन से जुड़े गंभीर अपराधों के खिलाफ पर्याप्त दंडात्मक व्यवस्था बनाए रखना है।
मंत्रालय के मुताबिक, पेट्रोलियम कानून में आखिरी बड़ा संशोधन 1970 में हुआ था। उस समय धारा 23 के तहत जुर्माना 500 रुपये से बढ़ाकर एक महीने तक साधारण कारावास या 1,000 रुपये जुर्माना किया गया था। दोहराए गए अपराधों के लिए तीन महीने तक कारावास या 5,000 रुपये तक जुर्माने का प्रावधान किया गया था।
मंत्रालय ने कहा कि 1970 में पेट्रोल की कीमत करीब 0.90 रुपये प्रति लीटर थी, जबकि 2026 में यह 95-105 रुपये के बीच है। यानी कीमतों में 10,000 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है और पुराने दंड अब प्रभावी निवारक नहीं रह गए हैं।
प्रस्तावित प्रावधानों को भारत के अन्य कानूनों और अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी तथा सिंगापुर की व्यवस्थाओं को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।