दवा अनुसंधान में भारत की बड़ी छलांग, 1,095 नई ड्रग परियोजनाओं पर काम

जेनेरिक से आगे बढ़ते भारत में 195 कंपनियां 1,095 नई ड्रग परियोजनाओं पर काम कर रही हैं, पिछले दशक में 10 नोवेल ड्रग एसेट्स का विकास
जेनेरिक दवाओं के वैश्विक केंद्र के रूप में पहचान बनाने के बाद भारत अब नई दवाओं (नोवेल ड्रग्स) के अनुसंधान और विकास में तेजी से आगे बढ़ रहा है
दवा अनुसंधान में भारत की बड़ी छलांग, 1,095 नई ड्रग परियोजनाओं पर काम
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नई दिल्ली : जेनेरिक दवाओं के वैश्विक केंद्र के रूप में पहचान बनाने के बाद भारत अब नई दवाओं (नोवेल ड्रग्स) के अनुसंधान और विकास में तेजी से आगे बढ़ रहा है। बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (BCG) और हेल्थकोइस की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार, देश में दवा खोज (ड्रग डिस्कवरी) से जुड़े कार्यक्रमों की संख्या बढ़कर 1,095 हो गई है, जिन पर 195 कंपनियां काम कर रही हैं। पिछले एक दशक में भारत ने 10 नई दवा परिसंपत्तियां (नोवेल ड्रग एसेट्स) विकसित की हैं।

फार्मा पेटेंट की संख्या बढ़कर 2995

रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में फार्मा क्षेत्र में प्राइवेट इक्विटी (PE) और वेंचर कैपिटल (VC) निवेश बढ़कर 731 मिलियन डॉलर पहुंच गया, जो पांच साल पहले की तुलना में 2.1 गुना अधिक है। इसी अवधि में देश में बायोटेक स्टार्टअप्स की संख्या 1,500 से बढ़कर 2,400 हो गई, जबकि फार्मा पेटेंट 2015 के 716 से बढ़कर 2024 में 2,995 हो गए।

अगले 3-4 वर्षों में 4 अरब डॉलर के निवेश का अनुमान

बीसीजी इंडिया की मैनेजिंग डायरेक्टर प्रियंका अग्रवाल ने कहा कि भारत अब केवल जेनेरिक दवाओं की नकल करने वाला देश नहीं, बल्कि नई दवाओं के विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है। हालांकि, इस क्षमता को पूरी तरह साकार करने के लिए शुरुआती निवेश, अनुसंधान, क्लीनिकल ट्रायल ढांचे, नियामकीय सुधार और उद्योग-अकादमिक साझेदारी को मजबूत करना होगा। उनका अनुमान है कि अगले तीन-चार वर्षों में इस क्षेत्र में करीब चार अरब डॉलर का पीई/वीसी निवेश आ सकता है।

दुनिया की 15 प्रतिशत बीमारी का बोझ उठाता है भारत

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत दुनिया की 15 प्रतिशत बीमारी का बोझ उठाता है, लेकिन वैश्विक क्लीनिकल ट्रायल में उसकी हिस्सेदारी सिर्फ चार प्रतिशत है। वहीं, भारत का वार्षिक फार्मा अनुसंधान एवं विकास (R&D) खर्च 2-3 अरब डॉलर है, जबकि अमेरिका में यह 70-75 अरब डॉलर के बीच है।

कई स्वदेशी दवाएं हुईं है विकसित

रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय कंपनियां अब कई रास्तों से वैश्विक पहचान बना रही हैं। जाइडस ने सारोग्लिटाजार और डेसिडुस्टैट जैसी स्वदेशी दवाएं विकसित की हैं, जबकि ग्लेनमार्क ने अपनी नई दवा के लिए एबवी के साथ 700 मिलियन डॉलर का लाइसेंसिंग समझौता किया। इम्यूनोएसीटी ने स्वदेशी CAR-T थेरेपी को दक्षिण अफ्रीका, अल्जीरिया और मोरक्को तक पहुंचाने के लिए सिप्ला के साथ साझेदारी की है, जबकि पेप्ट्रिस ने भारत की पहली एआई-आधारित दवा उम्मीदवार का लाइसेंस विदेशी कंपनी को दिया है।

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