

डॉलर से दूरी, लेकिन नई मुद्रा से अभी परहेज
कोलकाता: दुनिया के आर्थिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। ऐसे समय में BRICS के मंच से डॉलर पर निर्भरता कम करने की चर्चा ने एक बार फिर जोर पकड़ा है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि BRICS देश मिलकर जल्द ही डॉलर की जगह कोई नई साझा मुद्रा लाने जा रहे हैं। नई दिल्ली में हुए BRICS Summit 2026 में तस्वीर कुछ अलग दिखाई दी। जोर किसी नई मुद्रा पर नहीं, बल्कि आपसी कारोबार में स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल और भुगतान व्यवस्था को आसान बनाने पर है।
BRICS की अपनी अलग मुद्रा बनाने की चर्चा नई नहीं है। लेकिन सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं, व्यापार और आर्थिक नीतियों में काफी अंतर है। ऐसे में एक नई BRICS मुद्रा शुरू करने के लिए सभी देशों के बीच लंबे समय तक सहमति और एक मजबूत वित्तीय व्यवस्था की जरूरत होगी। फिलहाल यह रास्ता काफी लंबा नजर आता है।
यही वजह है कि BRICS का मौजूदा जोर स्थानीय मुद्रा में कारोबार पर है। यानी दो देश आपस में व्यापार करते समय हर लेन-देन के लिए डॉलर का इस्तेमाल करने के बजाय अपनी-अपनी मुद्रा में भुगतान कर सकें। इससे डॉलर की जरूरत कुछ हद तक कम हो सकती है और भुगतान की लागत भी घट सकती है।
भारत के लिए डॉलर पर निर्भरता कम करना आकर्षक जरूर है। खासकर कच्चे तेल जैसे जरूरी आयात में डॉलर की भूमिका काफी बड़ी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों और डॉलर की मजबूती का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। ऐसे में भुगतान के दूसरे रास्ते तैयार करना भारत के लिए उपयोगी हो सकता है।
लेकिन स्थानीय मुद्रा में कारोबार का अपना एक पेच भी है। भारत का BRICS देशों के साथ व्यापार संतुलित नहीं है। वित्त वर्ष 2025-26 में BRICS देशों के साथ भारत का व्यापार घाटा करीब 226 अरब डॉलर रहा। यानी भारत ने इन देशों से जितना सामान खरीदा, उसके मुकाबले निर्यात काफी कम रहा।
ऐसे में केवल डॉलर की जगह रुपये में भुगतान शुरू कर देना समस्या का पूरा समाधान नहीं है। अगर किसी देश के साथ भारत का व्यापार लगातार घाटे में रहता है, तो उस देश के पास जमा भारतीय रुपये का इस्तेमाल करने के विकल्प सीमित हो सकते हैं। रूस के साथ रुपये-रूबल कारोबार में भी ऐसी ही मुश्किलें सामने आ चुकी हैं।
भारत इस दिशा में केंद्रीय बैंक की डिजिटल मुद्रा यानी CBDC (Central Bank Digital Currency) को भी एक विकल्प के तौर पर आगे बढ़ा रहा है। इसका मकसद अलग-अलग देशों की डिजिटल मुद्राओं के बीच सीधे भुगतान की व्यवस्था तैयार करना है। मौजूदा अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था में कई बैंक और मध्यस्थ शामिल होते हैं। डिजिटल मुद्रा आधारित व्यवस्था इन चरणों को कम कर सकती है, जिससे भुगतान तेज और सस्ता हो सकता है।
हालांकि, इससे व्यापार घाटे की समस्या खत्म नहीं होगी। डिजिटल रुपया आखिर रुपया ही रहेगा। इसलिए भारत के लिए असली चुनौती डॉलर को हटाना नहीं, बल्कि ऐसा व्यापार तंत्र तैयार करना है जिसमें स्थानीय मुद्राओं में कारोबार व्यावहारिक और संतुलित हो।
BRICS की कोशिश को फिलहाल डॉलर के खिलाफ सीधी लड़ाई के बजाय उसके विकल्प तैयार करने की कोशिश के रूप में देखना ज्यादा सही होगा। डॉलर की जगह किसी एक नई मुद्रा को लाना आसान नहीं है। लेकिन अगर सदस्य देश धीरे-धीरे स्थानीय मुद्राओं में कारोबार और आपसी भुगतान व्यवस्था को मजबूत करते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर पर निर्भरता कुछ कम जरूर हो सकती है।